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कल्पनाओं से प्रेम कर लिखी कामयाबी की दास्तान
अरमान को लगे पंख, अथक परिश्रम से सपनों में भरे रंग
वेलेंटाइन सिर्फ रोमांस और प्रेम के इजहार का दिन नहीं है। यह कल्पनाओं को सच करने के लिए प्रेरणा देने का भी दिन है। सपनों से प्यार करने और उन्हें पाने के लिए ऊंची उड़ान भरने के संकल्प का दिन है। प्रेम के नए अर्थ तलाशने की दूसरी कड़ी में हम कुछ ऐेसे लोगों के बारे में बता रहे हैं जिन्होंने अपनी कल्पनाओं और सपनों से प्रेम किया और अथक परिश्रम के बूते उन्हें सच करने में कामयाबी पाई।

गांव में जिंदगी बीताकर बीन बच्चों को बना दिया आईएएस और आईपीएस
लक्ष्मणपुर विकास खंड के इटौरी गांव निवासी अनिल प्रकाश मिश्र ने बड़ौदा उप्र ग्रामीण बैंक में छोटी सी नौकरी करके अपने बच्चों को आईएएस और आईपीएस बनाने का सपना देखा था। प्राथमिक शिक्षा गांव में देने के बाद बच्चों की पढ़ाई के लिए ऐसा माहौल तैयार किया कि उन्होंने पिता के संकल्प को पूरा करने का प्रण किया। अपनी सुविधाओं में कटौती करबच्चों की पढ़ाई के साथ उनकी हर मांग पूरी की। उनकी अथक मेहनत का नतीजा था कि दो तीन बच्चे आईएएस और आईपीएस में चुने गए। आईपीएस बेटी क्षमा कर्नाटक, आईएएस बेटी माधवी झारखंड और आईएएस बेटा लोकेश बिहार में तैनात हैं। वर्तमान में बड़ौदा उप्र ग्रामीण बैंक के शाखा प्रबंधक अनिल प्रकाश मिश्र कहते हैं कि बच्चों को मुकाम तक पहुंचाने में परिल्वार को कड़ी तपस्या करनी होती है। बच्चों की सफलता के लिए दिन-रात एक करना पड़ता है।
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बेटे के आईपीएस बनने पर पिता की आंखों से छलक उठे थे आंसू
मूलत: जौनपुर के निवासी और शहर के पल्टनबाजार में किराए के मकान में रहने वाले निवासी रमेश सिंह ने कृषि विभाग में नौकरी करके बेटे को पुलिस अधिकारी बनाने का सपना संजोया था। वर्ष 2009 में आईपीएस की परीक्षा उत्तीर्ण करने पर पिता की आंखों से आंसू छलक पड़े थे। कृषि विभाग में एक साधारण कर्मचारी के रूप में तैनाती पाने वाले रमेश सिंह की मानें तो अमित प्राइमरी शिक्षा के साथ ही हाईस्कूल और इंटरमीडिएट की पढ़ाई शहर के जीआईसी से करने के बाद स्नातक करने इलाहाबाद गए थे। रमेश कहते हैं कि हमें विश्वास नहीं था कि बेटा इतनी जल्दी मंजिल हासिल कर लेगा, मगर उसने सपने सच करने के लिए रात-दिन एक कर दिया।

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दो जून की रोटी का इंतजाम करते-करते खड़ी कर दी करोड़ों की सल्तनत
शहर के अष्टभुजानगर स्थित प्रभात एकेडमी के प्रबंधक डॉ. प्रभात शर्मा आज पहचान के मोहताज नहीं हैं। वह शहर के उन प्रतिष्ठित संस्थानों में अपना नाम दर्ज करा चुके हैं, जहां से निकलने वाले बच्चे आईएएस, आईईएस और पीसीएस में चयनित हो रहे हैं। इनकी कामयाबी के पीछे दूरदृष्टि और पक्का इरादा है। 1989 में दो जून की रोटी का इंतजाम करने के लिए प्रभात ने बच्चों को कोचिंग पढ़ाना प्रारंभ किया और कड़ी मेहनत करके आज करोड़ों रुपये की सल्तनत खड़ी कर दी है। बाबागंज से कोचिंग की शुरुआत करने वाले डॉ. प्रभात शर्मा के सामने कई बार विपरीत परिस्थितियां भी आईं, मगर उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। 1995 में अष्टभुजानगर में प्रभात एकेडमी की नींव रखी और वर्ष 1998 में शुभारंभ किया। यही, नहीं बिहारगंज में बीटीसी कालेज कालेज की स्थापना की है। जिले में उनका एक मात्र आईसीएससी बोर्ड का कालेज है।

कोचिंग पढ़ाकर संयुक्त निदेशक बने प्रदीप
शहर के पूर्वी सहोदरपुर निवासी और वर्तमान में संयुक्त शिक्षा निदेशक बरेली डॉ. प्रदीप सिंह ने बच्चों को कोचिंग पढ़ाकर अपना भविष्य संवारा। परिवार की माली हालत ठीक नहीं होने के कारण शुरुआत में उन्होंने बाबागंज में बच्चों को कोचिंग पढ़ाना शुरू किया। अपनी कक्षा से छोटी कक्षा के बच्चों को पढ़ाना और फिर स्कूल का होमवर्क करना डॉ. प्रदीप के लिए काफी जटिल कार्य था। मगर उन्होंने परीक्षा के समय में भी कोचिंग पढ़ाना नहीं बंद किया। बेल्हा से इलाहाबाद पढने के लिए गए तो भी कोचिंग पढ़ाने का सिलसिला चलता रहा। बकौल प्रदीप घर से इतने रुपये नहीं मिलते थे, मगर परिवार से मिलने वाले प्रोत्साहन से जीवन को संवारने का मौका मिला। शिक्षा विभाग के साथ ही कई और नौकरियां मिलीं, मगर उन्हें मैने ठुकरा दिया।
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मजदूरी कर बच्चों को करा रहे आईआईटी की पढ़ाई
सांगीपुर विकास खंड के रेहुआ लालगंज निवासी धर्मराज सरोज मेहनत, मजदूरी करके अपने बच्चों का भविष्य संवार रहे हैं। गुजरात के सूरत में एक फैक्टरी में काम करने वाले धर्मराज का सपना है उनके पांचों बेटों को अच्छी नौकरी मिल जाए। उनके दो बेटे राजू सरोज खडग़पुर और गिरजेश कुमार मुंबई में आईआईटी फाइनल इयर के छात्र हैं। दोनों बेटों के एक साथ आईआईटी में सफल होने से परिवार के लोग खुशी से झूम उठे थे। वहीं दूसरी तरफ फीस अदा करने की चिंता सता रही थी। मगर लोगों ने राजू और गिरजेश की मदद के लिए हाथ बढ़ाया। धर्मराज की मानें तो अभी तीन बेटों की सफलता का संकल्प लिए हुए हैं। जब तक तीनों बेटों को सफलता नहीं मिलती है, तब तक वह अपने संकल्प को अधूरा मानते हैं।
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