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आगे धमाका, पीछे धमाका और चारों ओर बिछ गईं लाशें

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प्रतापगढ़। ‘12 मार्च 1993 की वो मनहूस दोपहर थी। बांद्रा से लोकल ट्रेन से भायखला स्टेशन पर उतरने के बाद बाहर निकला था। थोड़ी ही दूर गया था कि अचानक पीछे तेज धमाका हुआ। आंखों के सामने अंधेरा छा गया। चारों ओर चीखपुकार मच गई। विस्फोट में घायल होकर कराह रहे लोगों को रौंदते हुए लोग अपनी जान बचाने के लिए बदहवास भागने लगे। कुछ जान बचाने की गुहार लगा रहे थे, लेकिन सुनने वाला कोई नहीं था। अचानक आगे फिर तेज आवाज के साथ धमाका हुआ और चारों तरफ लाशें बिछ गईं। दिल-दिमाग सुन्न हो गया। इसके बाद फिर कुछ याद नहीं रहा।’
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मुंबई के सिलसिलेवार बम धमाकों में गंभीर रूप से घायल हुए दिनेश शुक्रवार को हालात बयां करते वक्त कांप उठे। चौबीस साल पहले लाशों के ढेर, खून से लथपथ होकर तड़पते लोग, दर्द से कराहते मासूम बच्चे और बदहवास होकर भागते लोगों का जिक्र करते उनके चेहरे पर भयानक मंजर का खौफ तारी था। इस घटना के दोषियों में दो को फांसी और दो को उम्रकैद की सजा सुनाए जाने के बाद भी दिनेश संतुष्ट नहीं हैं। उनका कहना है कि निर्दोषों की जान लेने वाले ऐसे लोगों को चौराहे पर खड़ा कर सीधे गोली मार देनी चाहिए।

ओझला निवासी दिनेश यादव 24 साल पहले नवंबर 1992 में रोजी-रोटी के सिलसिले में गांव के रामकैलाश गुप्ता के साथ मुंबई गए थे। सप्ताह भर बाद ही रामकैलाश ने उन्हें छोड़ दिया। दिनेश भायखला में एक सब्जी व्यापारी की दुकान पर काम करने लगे। 12 मार्च 1193 को वह अपने किसी परिचित से मिलने के लिए बांद्रा गए थे। लौटते समय लोकल ट्रेन में यात्रियों के बीच चर्चा हो रही थी कि मायानगरी में बम विस्फोट हो रहा है। सब सुरक्षित स्थान पर पहुंच जाएं। भायखला स्टेशन पर ट्रेन रुकी तो वह बाहर निकले और तेज कदमों से अपने ठिकाने की ओर चल पड़े। सड़कों पर लोगों की भारी भीड़ थी। सब अपने घर जाने के लिए भाग रहे थे। तभी पीछे सड़क किनारे खड़े एक वाहन में जोरदार विस्फोट हुआ। जिसके बाद लोगों की चीखें सुनाई पड़ने लगीं। हर कोई अपनी जान बचाने के लिए भागने लगे। वह भी बदहवास होकर भाग रहे थे। तभी करीब दौ सौ मीटर आगे फिर जोरदार धमाका हुआ। जिसकी आवाज से उसके आगे सन्नाटा छा गया। हर ओर चीख-पुकार और कोहराम मचा था। लोग खून से लथपथ पड़े थे। बहुत से लोगों की सांसें थम चुकी थीं और कई लोग दर्द से कराह रहे थे। उनके कपड़ों में आग लग गई और पैर व पीठ खून से सन गया। इसके बाद उन्हें कुछ होश न रहा। करीब दो माह बाद उन्हें होश आया, लेकिन उसकी याददाश्त जा चुकी थी।
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परेल के गांधी अस्पताल में उनका उपचार चल रहा था। अजय नाम के एक फौजी ने उन्हें अस्पताल पहुंचाया था। वह बराबर उनकी देखभाल करने के लिए आता था। वहां से उन्हें क्रिश्चियन अस्पताल में शिफ्ट कर दिया गया। वहां कुछ दिनों तक इलाज चला। वहां आराम नहीं मिला तो फौजी अजय के सहयोग से मदर टेरेसा अड़गांव नासिक अस्पताल लाया गया। करीब 6 माह तक चले इलाज के बाद उसकी याददाश्त लौटी। उन्होंने दूसरे से चिट्ठी लिखवाकर घर भेजवाया। पत्र मिलने के बाद पहुंचे परिजन उन्हें अपने साथ घर ले आए। घर के लोगों ने मान लिया था कि सिरियल ब्लास्ट में उनकी भी मौत हो चुकी है। सीरियल बम ब्लास्ट में घायल दिनेश यादव का मुंबई व नासिक के अस्पताल में 6 माह तक नियमित उपचार चलता रहा। याददाश्त लौटी तो खुद को अनजान स्थान पर पाया। अस्पताल के स्टाफ से बातचीत के बाद उन्हें पुरानी बातों की जानकारी हुई। इसके बाद वह अपने परिवार के लोगों को जीवित होने की जानकारी भेज सके।

12 मार्च 1993 को मुंबई में हुए सीरियल ब्लास्ट में 257 लोगों की मौत और 713 लोगों के घायल होने की जानकारी दिनेश को याददाश्त लौटने पर हो सकी। अब मुंबई जाने का जिक्र होने पर कहते हैं कि वह कभी मुंबई नहीं जाएंगे और सभी को वहां न जाने सलाह भी देते हैं। उनका कहना है कि भले ही देश की आर्थिक नगरी मुंबई है, लेकिन वहां कब क्या हो जाए, किसी को पता नहीं। नवंबर 1992 में दिवाली के पहले ही परिजनों से जिद कर दिनेश यादव अपने साथी रामकैलाश गुप्ता के साथ मुंबई चले गए। 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मसजिद विध्वंस के बाद भड़के दंगे की आग में वह भी झुलसने से बाल-बाल बचे थे। इसका खौफ उन्हें व उसके परिवार के लोगों को भी था। मुंबई में दंगों को देखते हुए दिनेश के परिवार के लोग उन्हें पड़ोसी हनुमत प्रसाद पांडेय के साथ घर आने के लिए दबाव डालने लगे, लेकिन वह नहीं आए। हनुमत को ट्रेन में बैठाने के लिए वह साथी रामकैलाश के साथ स्टेशन गए थे। वहां से अकेले ही लौट रहे थे। रास्ते में वह दंगाइयों के चंगुल में फंस गए, लेकिन एक गली उनके जीवन के लिए वरदान बन गई। वह गली में छिपकर अपने ठिकाने की ओर भाग निकले।

मुंबई में 12 मार्च 1993 को 13 सीरियल ब्लास्ट में बहुत से लोगों की जान चली गई थी। ऐसे में परिवार के लोग भी दिनेश को लेकर चिंतित थे। दिनेश के पिता मंगरू ने बताया कि ब्लास्ट की खबर गांव तक पहुंचीं। तब कुछ ही स्थानों पर फोन थे। जिससे बात होना आसान नहीं था। दिनेश अपने ठिकाने पर नहीं था। परिचित व रिश्तेदारों को उसके ठिकाने पर भेजा, लेकिन उसका कोई सुराग नहीं मिला। मुंबई के हालात ठीक होने पर बड़ा भाई सजीवन उसकी तलाश में मुंबई गया, लेकिन उसका कुछ पता नहीं लगा। कई माह बीतने के बाद उसे दुनिया से दूर जाने की बात वे लोग मान चुके थे। दिनेश चार भाइयों में सबसे छोटा था। वहां से लौटने के बाद उसकी शादी की गई। उसके दो बेटे व एक बेटी है। कंधई थाना क्षेत्र के ओझला निवासी दिनेश यादव को मुंबई सीरिलय ब्लास्ट ने ऐसा दर्द दिया जो जिंदगी भर दर्द देता रहेगा। विस्फोट से कपड़े जलने, पीठ में विस्फोट के बाद लोहे की बुलेट घुसने और बाएं पैर का पंजा झुलस जाने के कारण आज भी अंगुलियां अलग-अलग नहीं हो सकीं। नासिक अस्पताल से भाई सजीवन लेकर चला आया। जबकि वहां उसे इलाज के लिए दो माह रोका जा रहा था। दोबारा नई जिंदगी मिलने के बाद दिनेश खुद भी वहां एक पल रुकना नहीं चाह रहे थे।
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