ट्रांस शारदा क्षेत्र: बाढ़ से ज्यादा दर्द देते हैं झूठे वादे
उपनिवेशन योजना के तहत हरित क्रांति की प्रयोग स्थली के रूप में ट्रांस शारदा क्षेत्र में बसाई गई 13 कालोनियों के लोगों के लिए चुनाव के कोई खास मायने नहीं रखते। करीब ढाई दशक से ये लोग हर चुनाव में झूठे वादों के जरिये ठगे जा रहे हैं। शारदा के कटान से कई गांवों के साथ हजारा कस्बे में इंटर कॉलेज, थाना भवन, भरतपुर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के अलावा कई इमारतें और रिहायशी मकान नदी में समा चुके हैं। हजारों परिवार सबकुछ गंवाने के बाद खानाबदोशों जैसी जिंदगी गुजार रहे हैं। नेताओं से इनका सामना पांच साल में एकाध बार तभी होता है, जब वे वोट मांगने इनके बीच पहुंचते हैं। ट्रांस शारदा क्षेत्र की आबादी करीब 60 हजार है। 1960 में सूबे के विभिन्न स्थानों के भूमिहीन खेतिहर मजदूरों, भूमिहीन शिक्षित बेरोजगारों को उपनिवेशन योजना के तहत यहां 13 कालोनियां बनाकर बसाया गया था। इसके लिए 12 हजार एकड़ भूमि अधिगृहीत की गई। वन विभाग की भूमि का पुनर्गठन और ग्राम समाज की भूमि का स्थानांनतरण कराकर उपनिवेशन योजना में दर्ज किया गया। हालांकि लोगों को अभी तक भूमि पर मालिकाना हक नहीं मिला है। यहां बसी सभी 13 कॉलोनियों और पूरनपुर तहसील मुख्यालय के बीच शारदा नदी बहती है। कटान करते हुए नदी यहां दो धार बना चुकी है। बरसात बाद जब पानी कम होता है तो पीडब्ल्यूडी यहां नदी पार करने के लिए पैंटून पुल बनवा देता है जो तीन-चार महीने में ही टूट जाता है। इसके बाद छह महीनों से ज्यादा समय तक ट्रांस शारदा क्षेत्र के लोगों का संपर्क तहसील और जिला मुख्यालय से कटा रहता है। बहुत जरूरी हो तो क्षेत्र के लोगंों को खीरी के पलिया और मैलानी होते हुए 130 किमी की दूरी तय कर पूरनपुर पहुंचना पड़ता है। वैसे हजारा की पूरनपुर से दूरी 30 किमी ही है।
यह इलाका 1993 से बाढ़ से प्रभावित है। हर चुनाव में यहां के लोगों को शारदा की तबाही और बाढ़ से बचाव के लिए पुख्ता इंतजाम के साथ उन्हें कहीं अन्यत्र भी बसाने के आश्वासन दिए जाते हैं, लेकिन चुनाव बाद इन वादों की अहमियत नहीं रहती। शारदा कब किधर रुख कर तबाही शुरू कर दे, इसको लेकर यहां के लोग हमेशा ही दहशत के साये में रहते हैं।