बाघ या बाघिन की पहचान को लेकर वन अधिकारी अंत तक असमंजस में रहे। उसके पदचिह्नों के आधार पर बाघिन होना बताया जा रहा था लेकिन उसे ट्रैंक्युलाइज किये जाने के बाद बाघ होने की पुष्टि हुई। ऐसे में सवाल उठता है कि वन अफसर पदचिह्नों से उसकी पहचान क्यों नहीं कर सके। क्या कोई और बाघ या बाघिन क्षेत्र में है।
27 नवंबर 2016 को पिपरिया संतोष में गंगाराम को मारने के बाद वन विभाग की टीम ने क्षेत्र में पदचिह्न लिए थे। इसके आधार पर इसे बाघिन बताया गया था। पिपरिया संतोष के डगा में अहमद खां, पिपरिया संतोष में राजीव की मौत हो या पांच नवंबर को कुुंवरपुर, छह नवंबर को करनापुर और सात नवंबर को पिपरिया करम में हुए हमला। सभी में मिले पदचिह्नों के आधार पर वनकर्मी से लेकर अफसर इसे बाघिन बता रहे थे। इस बीच कुंवरपुर में हुए कैमरा ट्रैप के बाद से अधिकारी एक बार इसको लेकर उलझे भी थे लेकिन पिपरिया करम में मिले पदचिह्नों के बाद डीएफओ कैलाश प्रकाश ने भी इसे बाघिन ही बताया था। अब शनिवार को उसके पकड़े जाने के बाद मुस्तफाबाद गेस्ट हाउस में हुई जांच से उसके बाघ होने की पुष्टि की गई। सवाल यह उठता है कि आखिर अधिकारी पदचिह्नों के आधार पर बाघ या बाघिन में अंतर स्पष्ट क्यों नहीं कर सके। वहीं दूसरी ओर यदि पदचिह्नों से बाघिन होने की पुष्टि हुई थी तो पकड़ा गया बाघ कहां से आ गया। आशंका व्यक्त की जा रही है कहीं क्षेत्र में अभी कोई और बाघ या बाघिन तो नहीं घूम रही हैं। वन विभाग को बाघ के पकड्ने के बाद ही अपना आपरेशन समाप्त न कर क्षेत्र में इसकी व्यापक जांच पड़ताल करनी चाहिए ताकि भविष्य में कोई अन्य घटना न हो।