टाइगर रिजर्व को अस्तित्व में आए दो साल से अधिक बीत चुके हैं। यहां संसाधनों की उपलब्धता तो दूर स्टाफ की भी कमी बनी हुई है। इसकी वजह से जंगल की सुरक्षा के साथ ही बाघ की मानीटरिंग में भी कठिनाई हो रही है। वनरक्षकों से वन दरोगा का काम लिया जा रहा है, वहीं ट्रैक्टर क्लीनिक वाहन चल रहे हैं।
जिलें में 71.22 हजार हेक्टेअर में फैले टाइगर रिजर्व में वन्य जीवों व वन संपदा की सुरक्षा लिए पांच रेंज हैं। नौ जून 2014 को टाइगर रिजर्व घोषित होने पर उम्मीद की जा रही थी कि यहां संसाधनों के साथ पर्याप्त मात्रा में स्टाफ मुहैया कराया जाएगा, लेकिन प्रशासन और एनटीसीए के दावे खोखले साबित हुए। वाहनों के नाम पर डब्ल्यूडब्ल्यूएफ से मिली कुछ गाड़ियां हैं लेकिन उनके पास चालक नहीं हैं। इसके चलते ट्रैक्टर चालकों से गाड़ियां चलवाई जा रही हैं। सबसे ज्यादा दिक्कत स्टाफ की कमी से हो रही है। पांचों रेंजों में 50 वन दरोगा की नियुक्ति होनी चाहिए। इसके सापेक्ष मात्र 22 लोग तैनात हैं। आधे से भी कम संख्या में वन दरोगा होने के कारण सुरक्षा व्यवस्था प्रभावित हो रही है। मजबूरी में उनका काम वनरक्षकों से लिया जा रहा है। वन दरोगाओं के अलावा दो के स्थान पर एक एसडीओ, नौ के स्थान पर पांच रेंजर, 15 के स्थान पर मात्र एक चालक तैनात हैं।
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स्टाफ की स्थिति
पद नियतन उपलब्ध
डीएफओ 01 01
एसडीओ 02 01
रेंजर 09 05 (1 अटैच)
डिप्टी रेंजर 08 10
वनदरोगा 50 22 (1 अटैच)
वनरक्षक 52 44 (4 अटैच)
अर्दली 09 08
ड्राइवर 15 01
टैक्टर क्लीनर 21 17
डाकिया 07 02
चौकीदार 09 08
स्टाफ की कमी के चलते सुरक्षा में दिक्कत आती है। इसके लिए उच्चाधिकारियों को कई बार लिखा जा चुका है। चार दिन पूर्व ही पुन: पत्र भेजकर स्टाफ की मांग की गई है।
- कैलाश प्रकाश, डीएफओ, टाइगर रिजर्व