पीलीभीत। बाघ संरक्षण के नाम पर जंगल को टाइगर रिजर्व का दर्जा तो दे दिया गया, लेकिन संरक्षण के नाम पर कुछ खास न हुआ। चंद वॉच टॉवर और कुछ जलाशयों बनाकर बाघों के संरक्षण की बात की जाती है। इससे न तो बाघों का भला हो रहा है और जंगल से पास बसे इंसानों का। अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि साल भर के भीतर बाघों के हमलें में एक व्यक्ति की जान जा चुकी है तो कई घायल हो चुके है। वहीं आबादी क्षेत्र में कई बाघों की मौत भी हो चुकी है।
टाइगर रिजर्व में वन और वन्यजीवों की सुरक्षा के साथ मानव वन्यजीव संघर्ष के मुद्दे पर अफसर आए दिन बयानबाजी कर खुद के संजीदा होने का दावा तो कर रहे है, लेकिन ऐसा कोई पुख्ता कदम नहीं उठाया जा सका हैं। जिससे मानव वन्यजीव संघर्ष को रोका जाए। नतीजतन जंगल से दूर अमरिया तहसील क्षेत्र का इलाके हो या फिर जंगल सीमा से सटे अन्य गांव। सभी स्थानों पर कभी बाघ तो कभी तेंदुओं की चहलकदमी बनी रहती है। इसकी रोकथाम को लेकर समय से वन विभाग गंभीर के न होने के चलते वन्यजीवों की सुरक्षा खतरे में पड़ जाती है।
रेस्क्यू सेंटर न होने से इलाज के अभाव में हो रही वन्यजीवों की मौत
टाइगर रिजर्व में बाघ समेत अन्य वन्यजीवों की काफी संख्या है। जिसके चलते जंगल से बाहर बाघ समेत अन्य वन्यजीवों की चहलकदमी होती रहती है। वहीं उनकी सुरक्षा को लेकर कोई इंतजाम टाइगर रिजर्व में नहीं है। वन्यजीवों के बीमार होने पर उसे बाहर ले जाया जाता है और समय से इलाज न मिलने से मौत भी हो जाती है। बुधवार को ग्रामीणों के आक्रोश का शिकार हुई बाघिन की भी उपचार के अभाव में मौत हो गई। ऐसे में जरूरत है कि टाइगर रिजर्व में रेस्क्यू सेंटर स्थापित करने के प्रस्ताव पर शासन स्तर पर पहल कर उसको अमल में लाया जा सके।
हाथियों की कमी भी हो रही महसूस
टाइगर रिजर्व में संसाधनों की शुुरू से ही कमी है। बाघ समेत अन्य वन्यजीवों के रेस्क्यू करने के लिए अफसरों की ओर से आठ हाथियों की डिमांड करते हुए प्रस्ताव तो भेज दिया गया लेकिन अमल नहीं हो सका। वहीं पूर्व में कर्नाटक से आए हाथियों को दुधवा टाइगर रिजर्व में छोड़ दिया गया। ऐसा कहां गया था कि कुछ समय के बाद इनमें से कुछ हाथियों को टाइगर रिजर्व में भी पहुंचाया जाएगा, लेकिन वह भी नहीं हो सका। जिसके चलते मानव वन्यजीवों संघर्ष की स्थिति में वन्यजीवों का रेस्क्यू करना विभाग के लिए चुनौती बना हुआ है। बुधवार को भी बाघिन का रेस्क्यू करते समय हाथियों की कमी महसूस हुई।
दो साल में चार बाघों और पांच तेंदुए की हुई मौत
- फरवरी माह 2018 में बराही रेंज के अंतर्गत डगा बाइफरकेशन मार्ग पर मिला तेंदुए का शव
- 28 मार्च 2018 को शारदा सागर डैम में मिला बाघ का सड़ा गला शव
- 10 अप्रैल 2018 को बराही रेंज के अंतर्गत खारजा नहर की पटरी पर मिला बाघ का शव
- 20 अप्रैल 2018 को महोफ रेंज के कंर्पामेंट 112 में मिला बाघ का शव
- मई में मिला बराही रेंज के अंतर्गत खारजा नहर की पटरी पर मिला तेंदुए का क्षतविक्षत शव
- 08 नवंबर को बराही रेंज के जंगल में मिला तेंदुए का शव
- 19 अक्तूबर 2018 को असम हाईवे पर अज्ञात वाहन की टक्कर में हुई तेेंदुए की मौत
- 20 मार्च 2019 को माधोटांडा के डगा गांव के निकट हरदोई ब्रांच नहर में मिला मादा तेंदुए का शव
- 24 जुलाई 2019 को दियोरियां रेंज से सटे मटहेना कॉलोनी में ग्रामीणों की पिटाई से हुई बाघिन की मौत