वन विभाग के अधिकारियों ने बिना पोस्टमार्टम रिपोर्ट आए प्रथमदृष्टया उसकी मौत डूबने से हुई बताकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली। जबकि अधिकारी यह भली भांति जानते हैं कि बाघ नदी में आसानी से तैर सकता है। यही नहीं जंगल के निकट रहने वाले लोगों ने कई बार बाघ को नहर में तैरते देखा है वह भी तब जब नहर में पूरी क्षमता (3800 क्यूसेक पानी) बहता रहा है। जबकि इस समय तो नहर में क्षमता से आधे से भी कम मात्रा में (1400 क्यूसेक) पानी बह रहा था।
ऐसे में बाघ के पानी पीते समय अथवा तैर के पार जाते समय डूबने की बात किसी के गले नहीं उतर रही है। दूसरा यदि यह मान लिया जाए कि बाघ पानी में बहकर पीछे से आया है तो यहां से मात्र दो किलोमीटर बाइफरकेशन हेड हैं, जहां से नहर निकलती है। वहां सिंचाई विभाग का स्टाफ 24 घंटे निगरानी रखता है। यदि वह पीछे से बह कर आता तो सिंचाई विभाग के कर्मचारियों को जरूर दिखाई देता। मगर ऐसा नहीं हुआ। इसके अलावा बाइफरकेशन और घटना स्थल के मध्य एक झाल और भी है, जिसमें बाघ फंस सकता था।
डीएम ने भी देखा शव, ली जानकारी
पीलीभीत। टाइगर रिजर्व में बार-बार बाघों की मौत से जहां वन महकमा परेशान हैं वहीं प्रशासन भी सकते हैं। टाइगर रिजर्व में बाघ का शव मिलने को डीएम ओएन सिंह ने दुखद बताया और प्रभागीय वनाधिकारी कार्यालय पहुंचकर बाघ का शव देखने के बाद डीएफओ कैलाश प्रकाश से बाघ की मौत के बारे में जानकारी लेने के साथ उसके कारणों का पता लगाने के साथ टाइगर रिजर्व में बाघों की समुचित सुरक्षा व्यवस्था किए जाने के निर्देश दिए।