पीलीभीत। सरकार ने भले ही राजनीति में महिलाओं को सशक्त करने के लिए 33 फीसदी आरक्षण दिया हो, लेकिन जमीनी हकीकत इससे अलग है। चुनी गईं कई महिलाओं को परिजनों ने उनके अधिकारों से वंचित कर रखा है। जिले में चुनी गईं महिला ग्राम प्रधानों में अधिकतर ऐसी हैं जिनका सारा कामकाज उनके पति, पुत्र या अन्य परिजन संभाल रहे हैं। इतना ही नहीं, सरकारी बैठकों में भी महिला प्रधान की जगह हिस्सा ले रहे हैं और अधिकारी खामोश रहते हैं।
जिले की 720 ग्राम पंचायतों में करीब 336 की कमान महिला प्रधानों के हाथों में है लेकिन अधिकांश स्थानों पर सत्ता की बागडोर उनके पति, पुत्र, ससुर, भाई या अन्य परिजन के हाथों में है। सूत्रों का कहना है कि अधिकतर प्रधानों के मोबाइल नंबर उनके पति, बेटे या परिवार के अन्य सदस्य उठाते हैं। साथ ही अधिकतर के परिजन खुद को प्रधान बताते हैं।
ग्राम विकास के संबंध में होने वाली तमाम योजनाओं की जरूरी बैठकों में भी अधिकतर महिला प्रधान नहीं पहुंचती हैं। उनके प्रतिनिधि ही पहुंचते हैं। सिर्फ कागजों पर हस्ताक्षर महिला प्रधानों से करा लिए जाते है। कुछ पंचायतों में तो यह कार्य भी उनके प्रतिनिधि ही करते हैं। इस संबंध में प्रशासन की ओर से अब तक कोई कार्रवाई नहीं की गई है। जिम्मेदारों को अब भी इस संबंध में शिकायत का इंतजार है।
अब तक ऐसी कोई शिकायत नहीं आई है कि महिला प्रधानों के परिजन उनके अधिकारों का प्रयोग कर रहे हैं। अगर आती है तो कार्रवाई की जाएगी।
- सतीश कुमार, जिला पंचायतीराज अधिकारी