सब पढ़ें, सब बढ़ें। स्कूल चलो, घर-घर दीप जलाओ। यह सभी स्लोगन अब रटे रटाए हो गए हैं। हर साल करोड़ों रुपये फूंकने के बावजूद सरकारी स्कूल खुद को अस्तित्व में नहीं ला पा रहे हैं। यदि बेसिक शिक्षा विभाग की हालत पर गौर करें तो यहां नि:शुल्क शिक्षा घुटनों के बल चल ही रही है, साथ ही बच्चों के बैठने तक की सुरक्षित व्यवस्था नहीं है। जिले में तमाम ऐसे परिषदीय विद्यालय है जो सालों से जर्जर है। इनमें अधिकांश स्कूलों को जर्जर घोषित किया जा चुका है, लेकिन इनमें कई जर्जर स्कूलों में बच्चे पढ़ने को मजबूर हैं।
जिले में हैं लगभग सौ जर्जर स्कूल
खुद बेसिक शिक्षा के आंकड़ों पर गौर करें तो पूरे जिले में लगभग सौ परिषदीय स्कूल जर्जर हालत में हैं। इनमें सर्वाधिक जर्जर स्कूल अमरिया में हैं। यहां जर्जर स्कूलों की संख्या करीब 37 है। इसके अलावा सभी सात ब्लाकों में कुछ ऐसे जर्जर स्कूल भी हैं जिन्हें जर्जर की श्रेणी में नहीं रखा गया है। खास बात यह है कि कागजों में इन स्कूलों को निष्प्रोज्य घोषित कर आदेश जारी कर दिए गए, लेकिन इन जर्जर भवनों में अब भी पढ़ाई जारी है।
यह है कुछ जर्जर स्कूलों की दशा
अमरिया ब्लाक का प्राथमिक स्कूल परेवा वैश्य वर्ष 1993 में बनाया गया था। यहां चार अतिरिक्त कक्ष भी हैं। खास बात यह है कि यहां करीब छह सात साल पहले बने अतिरिक्त कक्ष गिरताऊ हाल में हैं। मजबूरन यहां के बच्चों को पुराने जर्जर घोषित हो चुके भवन में जान जोखिम में डालकर पढ़ना पढ़ रहा है। प्राथमिक विद्यालय मुड़सैना मदारी का भवन भी जर्जर है, यहां एक अतिरिक्त कक्ष से ही काम चलाया जा रहा है। वर्ष 1992 में बना प्राथमिक विद्यालय तिरकुनिया नसीर भी जर्जर घोषित हो चुका है। यहां एक अतिरिक्त कक्ष के सहारे ही पूरा स्कूूल चल रहा है। प्राथमिक विद्यालय माधोटांडा नंबर दो के जर्जर होने के चलते यहां एक अतिरिक्त कक्ष बनाया गया है। शहर का हाल देखें तो परिषदीय आदर्श प्राथमिक और पूर्व माध्यमिक विद्यालय विभाग के रडार पर जर्जर नहीं है, लेकिन यह स्कूल भी जर्जर हो चुके हैं। कक्षाओं के भीतर प्लास्टर टूटकर गिरना व बरसात में छत टपकना आम बात है।
कभी भी बन सकते हैं हादसे का सबब
विभाग द्वारा सौ स्कूलों को जर्जर तो घोषित कर दिया गया, लेकिन यह सभी अभी विद्यालय की बाउंड्रीवॉल के भीतर ही खड़े हैं। विभाग द्वारा इनकी नीलामी भी अभी तक नहीं की गई है। तर्क दिया जा रहा है कि जहां जर्जर स्कूल हैं, वहां अतिरिक्त कक्ष बनाए गए हैं, लेकिन कई स्थानों पर अतिरिक्त कक्षों की संख्या कम होने पर इन्हीं जर्जर भवनों में बच्चों को पढ़ाया जा रहा है। जो कभी भी किसी बड़े हादसे का सबब बन सकते हैं।
ब्लाकों से जर्जर स्कूलों की सूची मंगा ली गई हैं। इन जर्जर स्कूलों का शीघ्र मूल्यांकन कराकर नीलाम कराया जाएगा। खंड शिक्षा अधिकारियों को जर्जर भवनों में शिक्षण कार्य न कराने के निर्देश पूर्व में ही दिए जा चुके हैं।
- उमेश गौतम, प्रभारी बीएसए