ढकिया ताल्लुके महाराजपुर गांव के सौ थारू परिवार चक्की के दो पाटों के बीच पिस रहे हैं। ये सभी परिवार जिस भूमि पर बसे हैं, उसका ग्राम सभा न तो पट्टा कर रही है, और न ही वन विभाग ने उस जमीन पर अपना ठोस दावा किया है। इसके चलते थारू जनजाति के लोग विकास करने के बजाय पिछड़ते जा रहे हैं। शारदा नदी के पार ग्राम पंचायत नगरिया खुर्द कलां का मजरा ढकिया ताल्लुके महाराजपुर हैं। इस गांव में जिस भूमि पर सौ थारू जनजाति के परिवार बसे हैं, ग्राम समाज उस भूमि पर अपना दावा कर रही है। बताते हैं कि वर्षों पूर्व इस जमीन के 45 आवासीय पट्टे किए गए थे। इसके अलावा कृषि भूमि के पट्टे तो किए गए, लेकिन इन्हें बाद में आसामी पट्टे दर्शाकर समाप्त कर दिया गया था। स्थिति यह हैं कि ये परिवार लगभग चार सौ एकड़ भूमि पर खेती कर रहे हैं। इस जमीन का हर वर्ष रकवा भी बढ़ता जा रहा हैं, लेकिन पट्टों की कार्रवाई नहीं की गई। इधर, वन विभाग भी इस जमीन पर दावा कर रहा है। वन विभाग का कहना है कि संयुक्त सीमांकन के बाद तीन गांवो की भूमि का पता चलेगा कि कहां वन विभाग है और कहां राजस्व विभाग? इधर इस बात को लेकर लगभग एक दशक बीत चुका है, लेकिन वन विभाग इस इलाके में सीमांकन ही नहीं कर सका।
वन विभाग का इंतजार देख पड़ोसी गांव गुन्हान में भूमि हीनों के 138 पट्टे कर दिए गए, लेकिन थारू जनजाति के परिवार आज भी राजस्व प्रशासन के सामने टकटकी लगाए देख रहे हैं। यह थारू बस्ती हर साल ही कई-कई माह तक चारों ओर बाढ़ से घिरी रहती है। पूर्व प्रधान फिरुआ राना व पंचायत सदस्य राधे राना बताते हैं कि एक बार जिला जज टीम के साथ बस्ती को देखने आए थे। यहां उन्होंने लोक अदालत लगाकर हम लोगों पर दर्ज मुकदमे भी खत्म कर दिए थे, लेकिन अब पात्र होते हुए जनजाति के परिवारों को न तो इंदिरा आवास दिए जा रहे हैं न ही पेयजल आदि को लेकर हैंडपंप सुविधा। दो विभागों की खींचतान के चलते सभी काला पानी की जिदंगी गुजर बसर कर रहे हैं। इधर इस मामले में ग्राम प्रधान प्रतिनिधि परतोष राय कहते हैं कि थारू बस्ती में विकास कार्य तो कराना चाहते हैं, लेकिन वन विभाग बिना वजह का रोड़ा खड़ा कर देता है। यदि जमीन वन विभाग की है तो दस साल से सीमांकन क्यों नहीं कर रहा है?