इसमें सहकारी मिलें सबसे आगे हैं। मिल प्रबंधन खरीदे गए गन्ने के सापेक्ष चीनी उत्पादन कम होने की बात कहकर चीनी के दाम बढ़ाने की मांग करता है, वहीं दूसरी ओर बोरियों में अधिक चीनी भरकर मिलों को करोड़ों को चूना लगाया जा रहा है। पूरनपुर में रविवार को बोरियों में पकड़ी गई ओवरवेट चीनी इसी का एक नमूना है।
गन्ने से बनने वाली चीनी की मात्रा को चीनी मिलें गन्ना/चीनी परता कहती हैं। जिस गन्ने से जितनी अधिक चीनी बनती है उसका उसी के हिसाब से परता माना जाता है। कृषि वैज्ञानिक डॉ. एसएस ढाका के अनुसार सही गन्ने में 10 से 12 प्रतिशत तक चीनी परता आना चाहिए लेकिन जिले की किसी भी चीनी मिल में इस समय चीनी परता 10 प्रतिशत नहीं आ रहा। इसके कई अन्य कारण भी हो सकते हैं, लेकिन प्राइवेट मिलों की अपेक्षा सहकारी चीनी मिलों का हाल ज्यादा खराब है। जिले के दोनों सहकारी मिलों में इस समय चीनी परता लगभग 7 प्रतिशत बताया जा रहा है जो प्राइवेट से दो प्रतिशत कम है। सवाल यह उठता है कि एक ही क्षेत्र का गन्ना दो मिलों में जा रहा है तो उनमें परते का अंतर क्यों और कैसे? इसका राज रविवार को पूरनपुर सहकारी मिल में पकड़ी गई ओवरवेट चीनी बोरियों को देखकर लगाया जा सकता है। दरअसल मिल में चीनी की बोरियों में पैकिंग करते समय मिलीभगत के चलते अधिक चीनी भरी जाती है जिसे मिल से बाहर पहुुंचने पर बंटरबांट कर लिया जाता है। यह खेल सहकारी मिलों में अधिक होता है और यही कारण है कि जिले के दोनों सहकारी मिलें करोड़ों के घाटे में चल रही हैं जबकि मझोला की सहकारी मिल तीन साल पहले बंद हो चुकी है।
जिले की चीनी मिलों में परते की स्थिति
चीनी मिल परता
एलएच पीलीभीत 9.60
बजाज बरखेड़ा 9.10
सहकारी पूरनपुर 7.33
सहकारी बीसलपुर 7.42