विश्व स्वैच्छिक रक्तदान दिवस के उपलक्ष्य में रामलुभाई साहनी राजकीय महिला स्नातकोत्तर महाविद्यालय में हुई कार्यशाला में छात्राओं को रक्तदान के प्रति जागरूक किया गया है। वक्ताओं ने कहा कि महिलाओं में रक्तदान को लेकर तमाम भ्रांतियां हैं। आह्वान किया कि महिलाएं इनसे दूर रहकर रक्तदान करें।
जिला अस्पताल ब्लड बैंक के तत्वावधान में शुक्रवार को हुई कार्यशाला में मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डॉ. आरसी शर्मा ने कहा कि रक्तदान एक ऐसा माध्यम है जिससे प्राप्त एक यूनिट ब्लड से चार लोगों की जान बचाई जा सकती है। आरबीसी, डब्ल्यूबीसी, प्लेटलेट्स और प्लाजमा रक्त के चार कंपोनेंट्स होते हैं। ब्लड बैंक के लैब टेक्नीशियन दिग्विजय आर्य ने बताया कि रक्तदान वही कर सकता है जिसके रक्त में हीमोग्लोबिन की मात्रा 12.5 प्रतिशत से अधिक हो। वजन 45 किलोग्राम से अधिक हो और कोई गुप्त रोग न हो। उन्होंने शहर के युवा प्रदीप दुलवानी का उदाहरण देते हुए बताया कि 41 वर्षीय प्रदीप अब तक 65 बार रक्तदान कर चुके हैं। डॉ. दिनेश चंद्रा ने रक्त के बनने और टूटने के चक्र की जानकारी देते हुए बताया कि रक्त औसतन 120 दिन में स्वयं नष्ट हो जाता है तो क्यों न रक्तदान कर किसी को जीवनदान दिया जाए। प्राचार्य डॉ. आरसी वाजपेई ने कहा कि रक्त किसी कारखाने या किसी वैज्ञानिक तकनीक से नहीं बनाया जा सकता। यह केवल रक्तदान से ही किसी को प्राप्त हो सकता है। उन्होंने हरी सब्जियों और गुणवत्तायुक्त भोज्यपदार्थ खाने की सलाह दी।
डॉ. प्रमिला शर्मा ने कहा कि रक्त संबंधी भ्रांतियों से दूर रहकर महिलाओं को रक्तदान के प्रति सजग और जागरूक रहना चाहिए। डॉ. बीके राठी और डॉ. नरेंद्र बत्रा ने राष्ट्रीय सेवा योजना के स्वयंसेवकों से ग्रामीण अंचलों के लोगों को रक्तदान के प्रति जागरूक करने का आह्वान किया। इस मौके पर पंकज मिश्र, डॉ. नरेश पाल, दीपक विश्वास, जाकिर हुसैन, मनोज कुमार, रविंद्र कुमार आदि मौजूद रहे।