दिन के समय कमरों व गोदामों कोे रोशन करने के लिए रोशनदान अथवा टिनशेड के बीच फाइबर की सीट लगानी पड़ती थी लेकिन अब सोलर ड्रोम से बिना रोशनदान अथवा फाइबर सीट के भी रोशनी मिल सकेगी। इसके लिए डब्ल्यूब्ल्यूएफ ने दिन के समय बिना बल्ब के रोशनी देने वाला सोलर ड्रोम तैयार किया है।
सोलर एनर्जी के बढ़ते चलन के साथ ही इसके नये-नये अविष्कार भी सामने आ रहे हैं। अब डब्ल्यूडब्ल्यूएफ ने दिन के समय बिना बल्ब के रोशनी देने वाली लाइट तैयार की है, जिसे सोलर ड्रोम कहा गया है। नाम के अनुरूप दिन के समय सूरज की रोशनी इस ड्रोम में लगे रिफ्लेक्टर पर पड़ेगी जिससे ये बल्ब की तरह चमकने लगेगा। पिछले दिनों डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के परियोजना अधिकारी ने कलकत्ता से इसका प्रशिक्षण प्राप्त किया था। प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद अब उन्होंने जंगल क्षेत्र से सटे गांव में इन लाइटों को बनाने और लगाने का पायलेट प्रोजेक्ट प्रारंभ किया है। इसके तहत रमनगरा के महावीर स्वयं सहायता समूह के सदस्यों को जिला मुख्यालय पर इसके निर्माण का प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
500 रुपये आती है लागत
परियोजना अधिकारी नरेश कुमार ने बताया कि एक सोलर ड्रोम बनाने में लगभग 500 रुपये की लागत आती है।
सोलर प्लेट से भी जोड़ने की तैयारी
सोलर ड्रोम पर काम कर रहे परियोजना अधिकारी नरेश कुमार ने बताया कि अब तक तैयार सोलर ड्रोम केवल दिन के समय कमरों व गोदाम में रोशनी दे सकते हैं लेकिन भविष्य में इनसे रात को रोशनी लेने के लिए छोटी सोलर प्लेट और बहुत कम पावर की एलईडी लगाने का प्रयास भी किया जा रहा है।