पूरनपुर। सरकार भले ही महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) में प्रवासी मजदूरों और अन्य जॉबकार्ड धारकों को रोजगार देने के दावे करे, मगर हकीकत में ये दावे हकीकत कम, हवा-हवाई ज्यादा हैं। स्थानीय स्तर पर भी बाहर से आए प्रवासी मजदूरों को मनरेगा में काम देने के तमाम दावे किए गए, मगर लॉकडाउन के बाद अनलॉक-1 में भी जमीनी हालात ये हैं कि अधिकांश प्रवासी मजदूर मनरेगा में काम पाने के लिए भटक रहे हैं।
मनरेगा से जो काम हो भी रहे हैं, वे प्रधान और अफसरों की कमाई का जरिया बने हुए हैं। कच्चे कामों में कमीशनखोरी के तमाम हथकंडे अपनाकर अधिकांश ग्राम पंचायतों के प्रधान और सेक्रेटरी मिलकर अपनी जेबें ही भर रहे हैं क्योंकि इन्हें मनरेगा में काम कराने की कम, आने वाले पंचायती चुनाव में अपनी ताकि प्रधानी बचाने की चिंता अधिक है। इसलिए मनरेगा में काम देने के नाम पर मस्टर रोल भरके इसमें मोटा खेल हो रहा है।
पूरनपुर और माधोटांडा ब्लॉक यूं तो अलग-अलग है, लेकिन दोनों में मनरेगा के काम पूरनपुर ब्लॉक से ही होते हैं। इसकी वजह यह है कि माधोटांडा में अफसर और कर्मचारी बैठते ही नहीं। 189 ग्राम पंचायतों वाले पूरनपुर ब्लॉक में 62410 मनरेगा जॉबकार्ड धारक पंजीकृत है। इनमें से 55296 जॉब कार्डधारक सक्रिय हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार वर्तमान में 38106 मजदूर 564 कामों में लगे हैं।
काम से दरकिनार होकर भटक रहे प्रवासी
लॉकडाउन में 18 हजार प्रवासी मजदूर बाहर से घरों को पहुंचे। मनरेगा में काम के लिए 2224 प्रवासियों ने ब्लॉक में काम पाने के लिए अपने नाम दर्ज कराए। इनमें से कई ऐसे हैं, जिनके जॉबकार्ड पहले से बने है। ब्लॉक से उन्हें भी मनरेगा में काम देने का भरोसा दिलाया गया, जिनके जॉबकार्ड नहीं बने थे। मगर, यह सब आश्वासन तक ही सीमित रहा। बाहर से आए अधिकांश प्रवासी मजदूर मनरेगा में काम न मिलने से भटक रहे हैं। गांव खाता निवासी राजीव कुमार, अनुज यादव, माहित, मनोज, किशन लाल ने बताया कि लॉकडाउन में सहारानपुर से आने के बाद उन्हें गांव में भी मनरेगा के अंतर्गत मजदूरी नहीं मिल रही है। कई बार ब्लॉक के चक्कर लगाए। जॉबकार्ड ही नहीं बना। गांव रम्पुरा फकीरे के प्रधान राजकुमार का कहना है कि मनरेगा में एक जून से काम चल रहा है। उसमें मजदूर काम कर रहे हैं। हालांकि प्रधान मनरेगा में काम करने वाले मजदूरों की संख्या नहीं बता पाए। बोले डेढ़-दो सौ मजदूर लगे हैं। प्रवासी मजदूरों को काम देने के सवाल पर बोले- बाहर से आए अधिकांश प्रवासी फिर से पंजाब, हरियाणा या अन्य प्रदेशों को लौट गए हैं तो काम कहां से देते। गढ़ाकलां के प्रधान माया प्रकाश ने बताया कि जून में 15 दिन मनरेगा का काम चला। बारिश के बाद रोक दिया गया। प्रवासी मजदूरों में से किसी ने 10 तो किसी ने 12 दिन ही काम किया। एपीओ मनरेगा आदर्श कुमार बोले- ब्लॉक क्षेत्र में मनरेगा के अंतर्गत 564 काम हो रहे हैं। अप्रैल से अब तक 421050 मानव दिवस सृजित किए गए। मनरेगा में अधिकांश कच्चे काम करवाए जा रहे है। अब बरसात में पौधरोपण कराया जाएगा। ब्लॉक को 365000 पौधे रोपने का लक्ष्य मिला है।
मजदूर अधिक दिखाकर होता है खेल
मनरेगा में प्रधानों के करीबी कई ऐसे लोगों के जॉबकार्ड बने हैं, जो मौके पर कभी मजदूरी करने नहीं जाते। इनमें कुछ न काम करने वाले जॉबकार्ड धारक मजदूर वे होते हैं, जो प्रधान या रोजगार सेवक के करीबी होते हैं। वे काम नहीं करते हैं, मगर, मनरेगा में उन्हें मजदूरी का भुगतान किया जाता है। गैरहाजिर जॉबकार्ड धारकों को काम न करने के बाद भी हाजिरी लगाकर मनरेगा बजट में प्रत्येक ग्राम पंचायत में बड़ा खेल होता है। मजदूरी की धनराशि पात्र के खातों मेें पहुंचने के बाद उसका बंदरबांट किया जाता है।
बजट में हर किसी का कमीशन तय
पूरनपुर। सूत्रों के अनुसार मनरेगा में काम कराने पर प्रधान से लेकर सचिव और ऊपर तक सभी का कमीशन तय है। मस्टररोल में फर्जी मानव दिवस सृजित करने से लेकर कच्चे काम कराने तक में हर किसी को कमीशन देना होता है। मनरेगा में उन्हीं ठेकेदारों को काम दिया जाता है, जो पहले से तय होते हैं। कुछ प्रधान स्वयं ही रकम लगाकर काम करवाते है। संबंधित फर्मों को धनराशि ट्रांसफर होने के बाद उनमें हिस्सा बांट होता है। मस्टररोल निकलते ही सबका हिस्सा तय हो जाता है। मजदूरों की संख्या बढ़ाकर दिखाने के अलावा मनरेगा में ऐसा घटिया काम कराया जाता है, जिनके सबूत आगे चलकर नहीं मिलते।
प्रधान बोले- ऑडिटर समेत सबका होता है हिस्सा
एक प्रधान के अनुसार मनरेगा में घपलेबाजी रोकने के लिए ऑडिट भी होता है। नाम न छापने की गुजारिश पर प्रधान ने बताया कि ऑडिटर समेत हर किसी को तय कमीशन देना पड़ता है। अगर कमीशन नहीं मिला तो प्रधान और सचिव का ऑडिट में फंसना तय है। फिर ब्लॉक में जेई और अन्य अफसर कर्मचारियों का भी हिस्सा पहुंचाना होता है।
55 प्रतिशत पंचायतें प्रधान प्रतिनिधियों के हवाले
ब्लाक की 189 ग्राम पंचायतों में 76 महिला प्रधान हैं। अधिकांश महिला प्रधानों का काम उनके पति या फिर बेटे संभाले हुए हैं। दर्जन भर से अधिक पुरुष प्रधानों का काम उनके बेटों और भाइयों ने संभाल रखा है। कुछ प्रधानों ने अपने रिश्तेदार रोजगार सेवक भी बना रखे हैं। वह रोजगार सेवक अपने काम के साथ प्रधानी भी चलाते हैं।
ब्लॉक में 2225 प्रवासी मजदूर आए। इनमें 906 को जॉबकार्ड जारी किए गए। 450 मजदूरों के जॉबकार्ड पहले ही बने हुए थे। 100 मनरेगा मजदूरों के जॉबकार्ड बंद (एक्सपायर) हो गए थे। उनका नवीनीकरण किया गया है। मनरेगा में 1964 नए मजदूरों से काम लिया जा रहा है। अधिकतर कच्चे काम जैसे तालाब खुदान, नाला, चकरोड के काम कराए जा रहे हैं। सभी का भुगतान ऑनलाइन है। घपलेबाजी नहीं हो रही है। - नीरज दुबे, खंड विकास अधिकारी।