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जर्जर भवनों में ही चल रही हैं कक्षाएं

Fri, 21 Apr 2017 11:22 PM IST
पीलीभ्ाीत ब्यूराो
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 बेसिक शिक्षा विभाग द्वारा जिले में संचालित परिषदीय विद्यालयों में शिक्षा को पटरी पर लाने के लिए हर साल करीब 300 करोड़ रुपये से अधिक फूंके जाते हैं, लेकिन इन विद्यालयों में पढ़ने वाले लाखों नौनिहालों को न तो बेहतर शिक्षा मिली और न ही उन्हें सुविधाएं मिली। खास बात यह है कि साल भर के कुल बजट में 75 फीसदी रकम शिक्षकों के वेतन पर खर्च होती है।
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जिले में वर्तमान में 1320 प्राथमिक व 570 उच्च प्राथमिक विद्यालय हैं। इन विद्यालयों में करीब 5042 शिक्षक तैनात हैं। बच्चों को शिक्षा से जोड़ने के लिए शासन द्वारा मिड डे मील, निशुल्क पाठ्य पुस्तक, ड्रेस वितरण आदि योजनाएं संचालित की जा रही है। इसके अलावा समय-समय पर शैक्षिण गुणवत्ता सुधार के लिए भी अभियान चलाए जाते हैैं, लेकिन जिले के सरकारी स्कूलों में शिक्षा के स्तर का ग्राफ ऊपर उठने का नाम नहीं ले रहा है। 
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हर साल खर्च होते हैं 300 करोड़ से अधिक
जिले के 1800 परिषदीय विद्यालयों के संचालन में हर साल करीब 300 करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए जाते हैं। इसमें निशुल्क यूनिफार्म पर करीब सात करोड़ रुपये, निशुल्क पुस्तक पर 2.5 करोड़, स्कूल ग्रांट (रंगाई पुताई आदि) पर 3.5 करोड़, मेंटीनेंस ग्रांट पर चार करोड़ समेत अन्य मदों पर मोटी रकम खर्च की जाती है। इसी बजट से शिक्षकों को भी वेतन दिया जाता है। वहीं जिले के नौ कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालयों पर साल भर में करीब चार करोड़ रुपया खर्च किया जाता है। 
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कुल बजट का 75 फीसदी शिक्षकों के वेतन में होता है खर्च 
कुल बजट का करीब 75 से 80 फीसदी हिस्सा अकेेले परिषदीय विद्यालयों मे पढ़ाने वाले शिक्षकों पर खर्च किया जा रहा है। हर माह वेतन के रूप में 21 करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं। इसके बावजूद स्कूल बंद होने, शिक्षकों के समय से स्कूल न पहुंचने, शिक्षण कार्य में लापरवाही बरतने की शिकायतें सामने आती रहती हैं। वर्तमान में जिले के प्राथमिक स्कूलों में 3431 शिक्षक व उच्च प्राथमिक स्कूलों में 1611 शिक्षक तैनात हैं।
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20 करोड़ से अधिक खर्च, फिर भी होती है एमडीएम की शिकायतें 
जिले के परिषदीय स्कूलों में मिड डे मील के नाम पर एक साल में करीब 16 से 18 करोड़ रुपये खर्च किए जाते हैं। वहीं मिड डे मील बनाने वाले रसोइयों के ऊपर साल भर में करीब पांच करोड़ से अधिक खर्च किए जाते हैं। इन सबके कहीं खाद्यान्न तो कहीं दूध तो कहीं-कहीं गुणवत्तापरक भोजन न मिलने की शिकायतें महकमे के अधिकारियों से लेकर जिला प्रशासन के पास आती ही रहती हैं।
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70 जर्जर भवनों में हो रही पढ़ाई
जिले में परिषदीय विद्यालयों के भवनों पर गौर करें तो वर्तमान में करीब 70 ऐसे स्कूल हैं, जिनके भवन साल दर साल जर्जर होते जा रहे हैं। जानकारी होने के बाद भी महकमा शिक्षकों व बच्चों की जिंदगी के साथ खिलवाड़ करता आ रहा है।
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नहीं सुधर रही व्यवस्था
नौनिहालों को बेहतर शिक्षा देने के जिम्मेदार शिक्षक का पूरा ध्यान पढ़ाई पर केंद्रित न होकर एमडीएम व दूध वितरण पर रहता है। स्कूलों में बच्चों को फल व दूध देने के आदेश के बाद तो स्थिति और भी खराब हो गई। शिक्षकों का अधिकांश समय भोजन, फल, दूध वितरण मेें निकल जाता है।
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परिषदीय स्कूलों में शैक्षिक गुणवत्ता पर फोकस किया गया है। इसमें काफी हद तक सफलता भी मिली है। जो कमियां हैं उनमें सुधार लाने के प्रयास भी तेजी से चल रहे हैं। इसमें अभिभावकों का भी सहयोग जरूरी है।  
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- मसऊद अख्तर अंसारी, बीएसए 
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- 1800 परिषदीय विद्यालय है जिले में 
- 1.80 लाख बच्चे पढ़ते हैं स्कूलों में
- 5,042 शिक्षक तैनात हैं इन स्कूलों में  हैं
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