पीलीभीत। पीलीभीत टाइगर रिजर्व (पीटीआर) में लगातार घायल बाघ और बाघिन मिलने की घटनाएं निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर रही हैं। हर बार विभाग इन घटनाओं को बाघों के बीच आपसी संघर्ष का परिणाम बताकर अपनी जिम्मेदारी पूरी मान लेता है, लेकिन न तो किसी मामले की विस्तृत जांच रिपोर्ट सार्वजनिक की जाती है और न ही यह स्पष्ट किया जाता है कि आखिर जंगल में लगातार बाघ गंभीर रूप से घायल क्यों मिल रहे हैं।
शनिवार को ताजा माला रेंज का है, जहां शनिवार सुबह करीब आठ वर्ष की एक घायल बाघिन मिलने के बाद उसे रेस्क्यू कर उपचार शुरू कराया गया। प्रारंभिक तौर पर विभाग ने फिर वही पुराना कारण बताते हुए बाघिन के आपसी संघर्ष में घायल होने की आशंका जताई। हालांकि यह नहीं बताया गया कि संघर्ष किन परिस्थितियों में हुआ, घाव कितने पुराने हैं और क्या आसपास किसी अन्य बाघ की मौजूदगी के साक्ष्य मिले हैं।
इससे पहले अप्रैल में बराही रेंज में भी गर्दन पर गहरे घावों वाला एक बाघ पर्यटकों को दिखाई दिया था, लेकिन उसके बाद उसका कोई पता नहीं चल सका। इससे पहले 14 अप्रैल को बराही रेंज में जंगल सफारी के दौरान पर्यटकों ने गर्दन पर गहरे जख्मों वाला एक बाघ देखा था। सफारी में मौजूद पर्यटकों ने उसकी तस्वीरें खींचकर सोशल मीडिया पर साझा कीं तो मामला चर्चा में आ गया।
तस्वीरें वायरल होने के बाद वन विभाग ने निगरानी बढ़ाने और घायल बाघ की तलाश का दावा किया, लेकिन कुछ ही दिनों में मामला ठंडे बस्ते में चला गया। न तो यह जानकारी दी गई कि बाघ मिला या नहीं और न ही यह स्पष्ट किया गया कि उसकी गर्दन पर इतने गंभीर घाव कैसे आए।
वन्यजीव जानकारों का मानना है कि बाघों के बीच क्षेत्रीय संघर्ष सामान्य प्रक्रिया है, लेकिन हर गंभीर चोट को केवल इसी आधार पर जोड़ देना पर्याप्त नहीं माना जा सकता। यदि किसी बाघ के शरीर पर गहरे घाव हैं तो उनकी वैज्ञानिक जांच, कैमरा ट्रैप, मूवमेंट विश्लेषण और अन्य साक्ष्यों के आधार पर कारण स्पष्ट किए जाने चाहिए। डीएफओ मनीष सिंह के अनुसार, जंगल में बाघ समेत वन्यजीवों की सुरक्षा प्राथमिकता है। नियमित निगरानी पर जोर दिया जा रहा है। घायल बाघिन में प्रथमदृष्टया आपसी संघर्ष की स्थिति सामने आ रही है। संवाद