वन महकमे ने एसटीएफ की मदद से भले ही टाइगर रिजर्व में किए गए बाघों के शिकार का पर्दाफाश कर शिकारियों के नेटवर्क की कमर तोड़ दी हो, लेकिन अभी भी बाघों की हत्याओं को रोकने के लिए केंद्र और प्रदेश सरकार ने स्टाफ और संसाधन नहीं बढ़ाए हैं। ऐसे में पूर्व में हुई घटनाओं की पुनरावृत्ति की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है।
जनपद के टाइगर रिजर्व में जब बाघों की हत्याओं का सिलसिला शुरू हुआ था तो महकमा स्टाफ संसाधनों की कमी का रोना रो रहा था। महोफ के जंगल में शिकारियों ने बाघ का शिकार कर हाथ साफ कर लिए, लेकिन खटीमा क्षेत्र में शिकारियों के बंटवारे के चलते इस घटना का पर्दाफाश हुआ और शिकारी पकड़े गए थे। जिन्होंने महोफ के जंगल में शिकार करने के साथ जमीन में दबा मांस भी बरामद कराया था।
बराही जंगल में वर्ष 2014 में बाघों की हत्या का सिलसिला शुरू हो गया। इसे वन विभाग की लापरवाही कहा जाए या फिर संसाधन की कमी। बकौल जांच टीम: बाघ ने चीतल का शिकार किया था। उसके बाद शिकारियों ने बाघ का शिकार करने को चीतल के मांस में जहर मिलाया। शायद उन्हें मालूम था कि बाघ अधखाए चीतल को खाने जरूर आएगा और उसके खाने के बाद जहर से बाघ की हत्या की गई। इन सबको स्टाफ की कमी, मुखबिरतंत्र की कमजोरी से ही जोड़कर देखा जा रहा है। हालांकि इस रेंज में कई और बाघ भी मरे, जिसे स्वाभाविक मौत बताया गया था, लेकिन राज्यमंत्री हेमराज वर्मा ने उस दौरान बाघों की हत्या का मामला मुख्यमंत्री तक पहुंचाकर सनसनी फैला दी थी।