जिले में भले ही वर्ष 2011 से कोई पोलियो केस सामने नहीं आया है,
लेकिन पोलियो के बाद अब एक्यूट फ्लेसिड पैरालाइसिस (एएफपी) केसों की संख्या
बढ़ी है।
डब्ल्यूएचओ के सहयोग से वर्ष 1995 में शुरू हुए पल्स पोलियो अभियान ने सार्थक परिणाम दिए। वर्ष 2011 से जिले में पोलियो का कोई भी नया केस सामने नहीं आया। यह परिणाम बेशक अभियान की देन है, लेकिन इसके बाद जिले में एक्यूट फ्लेसिड पैरालायसिस (एएफपी) केसों की संख्या तेजी से बढ़ी है। महकमे के आंकड़ों पर गौर करें तो वर्ष 2013 में 220 और वर्ष 2014 में 175 एएफपी केस पाए गए हैं।
चार तरह की होती है विकलांगता
एएफपी एक ग्रुप है। जिसमें शरीर के अचानक लकवाग्रस्त होने व लुंजपुंज होने की जांच की जाती है। एएफपी केतहत विकलांगता को चार भागों में बांटा गया है। जिसके मुताबिक नसों में होने वाली विकलांगता को ट्रांसफर्स माइलाइटिस, कमर में होने वाली विकलांगता को जीबी सिंड्रोम, चोट लगने से होने वाली विकलांगता को ट्रामेटिक न्यूराइटिस का नाम दिया दिया गया है। जबकि चौथा पोलियो है।
मल नमूने की होती है जांच
एएफपी केस से जुड़े 15 वर्ष तक के बच्चों का स्टूल टेस्ट किया जाता है। मल का नमूना लेकर उन्हें मुंबई स्थित लैब भेजा जाता है, जहां उसमें पोलियो वायरस की जांच होती है। हालांकि वर्ष 2011 से अभी तक किसी भी एएफपी केस में पोलियो के वायरस नहीं पाए गए हैं।
एएफपी कोई बीमारी नहीं है, बल्कि यह एक ग्रुप है। शरीर को अचानक लकवा मारने या लुंजपुंज होने की दशा में उसे एएफपी केस (संदिग्ध पोलियो) मानकर पोलियो वायरस की जांच की जाती है। भ्रांतिवंश लोग उसे ही पोलियो ही मान लेते हैं।
डॉ. सीएम चतुर्वेदी, जिला प्रतिरक्षण अधिकारी
फैक्ट फाइल-
वर्ष 2013-220 एएफपी केस
वर्ष 2014- 175 एएफपी केस