शारदा के कटान से बर्बाद हो रहे ट्रांस शारदा क्षेत्र के युवा अभी भी
विकास का सपना संजोये हुए हैं। शारदा के थपेड़ों में इनमे से कईयों का एक
नहीं दो से तीन बार आशियाना नदी की भेंट चढ़ गया हो, लेकिन उनके बुजुर्गों
की हाड़तोड़ मेहनत व माटी की याद के आगे वह बाढ़ के दौरान खाना बदोशों सा
जीवन गुजारने वाले दर्द को भूल जाते हैं।
वह जानते हैं कि विकास की असली
कुंजी तो शिक्षा है, इस लिए पूरे क्षेत्र में उच्च शिक्षा की व्यवस्था न
होने का दर्द उनमे साफ झलकता है। विकास के पिछड़ेपन के लिए जितना वह दोषी
अफसरों को मानते हैं उतना ही जनप्रतिनिधियों को भी। इन सबके बाद भी उनकी
आंखे विकास की बाट जोहते अभी थकी नहीं हैं।
मतदान के दौरान भरतपुर गांव
में एक दुकान के बाहर बैठे तमाम युवा आपस में बातचीत करने के साथ कुछ
प्रशासनिक अफसरों के वाहन को आशा भरी निगाह से तांक रहे थे।
अमर उजाला टीम
ने जब इन युवाओं से बात करने का प्रयास किया तो वे पहले टाल गए, लेकिन बाद
में कुछ युवा चुनाव की बात न करने के वायदे पर बातचीत करने को तैयार हो गए।
भरतपुर निवासी अभिषेक यादव का कहना था कि गांव का विकास तो कई सालों से
कराया जा रहा है, बाढ़ आने के बाद नाममात्र का मुआवजा देकर कागजी खानापूरी
भी कर ली जाती है, लेकिन यहां की युवा पीढ़ी के लिए न तो किसी जनप्रतिनिधि
ने सोचा और न ही किसी अधिकारी ने।
कमलेश कुमार कहते है कि यहां एक इंटर
कॉलेज है, आगे की पढ़ाई के लिए या तो छह सात किलोमीटर दूर संपूर्णानगर
(खीरी) जाओ या फिर घर में बैठो। क न्हैया ने भी कमलेश के सुर में सुर
मिलाते हुए कहा कि गांव की लड़कियों ने डिग्री कॉलेज दूर होने के कारण
पढ़ाई ही छोड़ दी।
इक्का दुक्का लड़कियां साइकिलों से कॉलेज तक पहुंच पाती
हैं। अरविंद कुमार, मुन्ना मौर्य आदि क्षेत्र में उच्च शिक्षा व रोजगारपरक
शिक्षा के केंद्र खोले जाने के हिमायती दिखे।
जनता के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं ग्राम प्रधान
पूरनपुर।
पंचायत चुनाव के चौथे चरण में बुजुर्ग मतदाताओं ने भी उत्साहपूर्वक मतदान
में हिस्सा लिया। अधिकतर बुजुर्ग गांव में विकास न होने से काफी आहत दिखे।
रामनगर
निवासी भगवान प्रसाद कहते हैं कि जिंदगी में कई बार प्रधानी के लिए वोट
डाला, लेकिन विकास किसी ने नहीं कराया। अशोक नगर निवासी मातादीन भी गांव
में विकास कहते हैं कि हर बार विकास की बात कहकर हम बुजुर्गों का वोट हथिया
लिया जाता है, लेकिन उनकी सुनी कभी नहीं।
छोटे-छोटे काम कराने के लिए
प्रधान के घर कई कई चक्कर लगाना पड़ता है। कस्बा शेरपुरकलां की नौशरीबेगम
कहती हैं कि अब प्रत्याशियों में वो बात कहा। आजकल तो चुनाव सिर्फ पैसे का
रह गया है। लोगों ने अपने ईमान के साथ खिलवाड़ शुरू कर दिया तो चुनाव लडने
वालों ने भी वैसा ही रास्ता अख्तियार कर लिया।
मुझाकलां के बुजुर्ग अमरजीत
सिंह कहते हैं कि चुनाव का तो तरीका ही बदल गया है। पहले हाथ खड़ाकर प्रधान
चुन लिया जाता था। प्रधान गांव वालों की बात को गौर से सुनता था लेकिन
आजकल प्रधान विकास कम राजनीति में ज्यादा मशगूल रहते हैं।