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बाघों के लिए हैबिटैट बना गन्ना...व्यवहार में तेजी से आ रहा परिवर्तन

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पीलीभीत। टाइगर रिजर्व के सीमावर्ती इलाकों में गन्ने की खेती और वन्यजीव क्षेत्रों में इंसानों की बढ़ती दखलंदाजी बाघों के व्यवहार को तेजी से बदल रही है। ठंड के दिनों में गन्ने की फसल बाघिन के लिए जहां सबसे मुफीद वास (हैबिटैट) है, वहीं जंगलों में इंसानों की आवाजाही बढ़ने से बाघ के अंदर सदियों पुराना डर भी निकल रहा है। यही वजह है कि नरभक्षी न होते हुए भी बाघ इंसानों पर हमला करते आ रहे है। वन्यजीव विशेषज्ञों के मुताबिक जंगल सीमा से सटे क्षेत्रों में यदि गन्ने के बजाय अन्य फसलें पैदा की जाए तो बाघों के आबादी क्षेत्र में आने पर अंकुश लग सकता है।
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पूरे देश में यूपी इकलौता ऐसा प्रदेश है, जहां मानव और वन्यजीव संघर्ष को राज्य आपदा घोषित किया गया है। इसमें भी तराई के पीलीभीत समेत अन्य जिले शामिल हैं, जहां पूर्व वर्षों में मानव-वन्यजीव की घटनाओं में मरने वालों का आंकड़ा दहाई का अंक पार कर चुका है। यह दीगर बात है कि बाघों का कुनबा उसी जंगल में बढ़ता है, जहां जंगल का स्वास्थ्य अच्छा होता है। बाघ जंगल से दो ही परिस्थिति में बाहर आते हैं, पहला जब जंगल का स्वास्थ्य बेहतर न हो और दूसरा उनका कुनबा बहुत बढ़ गया हो। पीलीभीत टाइगर रिजर्व की बात करें तो विभागीय अफसर भी इस बात को स्वीकारते हैं कि जंगल में बाघों की संख्या बढ़ी है, ऐसे में अब जंगल का एरिया उनकी संख्या के आगे छोटा होता जा रहा है।
..तो इस वजह से जंगल से बाहर आते हैं बाघ
जिले के जंगल को टाइगर रिजर्व घोषित किए जाने के बाद यदि मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाओं पर गौर करें तो वर्ष 2014 से अब तक 25 व्यक्ति वन्यजीवों का शिकार हो चुके हैं। इतना ही नहीं 10 बाघों को भी अपनी जान गंवानी पड़ी हेै। हालांकि पिछले दो साल से मानव-वन्यजीव संघर्ष में काफी हद तक कमी आ चुकी है। वन्यजीव मामलों के विशेषज्ञ और भारतीय वन सेवा के अधिकारी वीके सिंह बतातेे हैं कि बाघों के वास स्थान के लिए गन्ने की फसल सबसे आदर्श स्थान है। नीलगाय, चीतल, सांभर और सुअर जैसे शिकार बाघ के यहां आसानी से मिल जाते हैं। पानी भी वहीं मिल जाता है। उनके लिए ये स्थान तब और मुफीद हो जाते हैं, जब बाघिन बच्चों को जन्म देती है। सामान्यत: ठंड के दिनों में ही बाघिन बच्चे जनती है।
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बाघों के अंदर इंसानों का डर हो गया खत्म
विभागीय आंकड़ों के मुताबिक नेपाल से सटे टाइगर रिजर्व में वर्तमान में 65 से अधिक बाघ हैं। तराई क्षेत्र होने के कारण इस जिले में गन्ने की पैदावार भी खूब होती है। यही कारण है कि शीत ऋतु में जब गन्ने की फसल कट रही होती है, इंसानों पर बाघ के हमले के ज्यादा मामले होते हैं। पहले घने जंगलों में मानव की आवाजाही कम होती थी, इसीलिए इंसान को लेकर बाघ के भीतर काफी डर बना रहता था। जैसे-जैसे वन्यजीव क्षेत्रों में इंसानों की आवाजाही बढ़ रही है, वैसे-वैसे बाघों के अंदर इंसानों का डर भी कम होता जा रहा है। इसलिए बाघ नरभक्षी न होते हुए भी इंसानों पर हमले कर रहे हैं।
वन्यजीव संघर्ष रोकने को फसल पैटर्न बदलना जरूरी
तराई क्षेत्र में फसलों का पैटर्न बदलकर इस समस्या पर काफी हद तक अंकुश लगाया जा सकता है। यह मुद्दा बाघ संरक्षण माह के तहत हुई जागरूकता गोष्ठी में डीएम वैभव श्रीवास्तव ने भी उठाया। उनका मानना है कि जंगल सीमा से सटे खेतों में गन्ने की मैंथा की पैदावार की जाए, इसे न तो तृणभोजी नुकसान पहुंचा सकते हैं और न ही बाघ इसमें ठहर सकता है। किसानों को भी इससे अच्छा खास मुनाफा होगा। उन्होंने पीटीआर के अफसरों से कृषि विभाग से मिलकर कार्ययोजना बनाने के भी आदेश दिए। हालांकि टाइगर रिजर्व प्रशासन भी इस मामले में पूर्व से प्रयासों में लगा हुआ है और किसानों को जागरूक करता आ रहा है।
मानव-वन्यजीव संघर्ष रोकने के लिए वृहद स्तर पर प्रयास चल रहे हैं। किसानों को गन्ने के अलावा अन्य फसलों का उत्पादन करने को लेकर जागरूक किया जा रहा है। इसका असर भी दिख रहा है। पिछले दो सालों से मानव-वन्यजीव संघर्ष में काफी तेजी से कमी आई है। -नवीन खंडेलवाल, डिप्टी डायरेक्टर, टाइगर रिजर्व प्रशासन
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