पीलीभीत। डीएम वैभव श्रीवास्तव के प्रयास से तैयार की गई पराली प्रबंधन परियोजना को अब प्रदेश के सभी जिलों में लागू किया जाएगा। शासन के अपर मुख्य सचिव अवनीश कुमार अवस्थी ने सभी जिलाधिकारियों को पीलीभीत के पराली प्रबंधन मॉडल अपनाने के आदेश जारी किए हैं।
एनजीटी और सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों के बाद भी प्रदेश के अधिकतर जिलों में पराली जलाने की घटनाओं पर अंकुश नहीं लग सका। सर्वोच्च न्यायालय ने पराली जलाने पर पूर्ण नियंत्रण न होने पर मामले को गंभीरता से लेते हुए एक सप्ताह के भीतर पराली जलाने की घटनाओं को शून्य किए जाने के निर्देश दिए थे। इस संबंध में शासन द्वारा सभी जिलों से सूचनाएं मांगी गईं थी, जोकि मात्र पीलीभीत जनपद से ही भेजी गई। इसमें डीएम वैभव श्रीवास्तव द्वारा पराली जलाने की घटनाओं की रोकथाम के लिए किए गए उपायों/ योजनों का विवरण दिया।
उन्होंने मनरेगा के अंतर्गत पूसा डी कंपोजर कैप्सूल और वेस्ट डीकंपोजर के माध्यम से प्रत्येक ग्राम पंचायत में 20 व्यक्तिगत और चार सामुदायिक परियोजनाएं चयनित कर कार्रवाई करने उल्लेख किया। इसमें सभी विकासखंडों में बैठकों में आयोजन, उड़नदस्तों का गठन, धार्मिक स्थलों पर लगे लाउडस्पीकरों और ठेलों पर लाउडस्पीकर को लगाकर मुनादी कराना, पराली का समुचित प्रबंध कराना, एफआईआर दर्ज करना आदि का उल्लेख किया गया। शासन ने डीएम वैभव श्रीवास्तव के प्रयासों से बनाई गई पराली प्रबंधन योजना को काफी सराहा। जिसकेे बाद शासन के अपर मुख्य सचिव अवनीश कुमार अवस्थी ने सभी जिलाधिकारियों को पीलीभीत पराली प्रबंधन योजना को लागू करते हुए उसकी प्रगति से शासन को अवगत कराने के आदेश दिए हैं।
ऐसे काम करती है पूसा डी कंपोजर कैप्सूल
पूसा डी कंपोजर एक कैप्सूल है। बीस लीटर पानी में एक कैप्सूल घोली जाती है, जो एक एकड़ खेत में छिड़काव के लिए पर्याप्त होती है। छिड़काव के पंद्रह दिन के भीतर पराली नष्ट होकर जैविक खाद में तब्दील हो जाती है। इसके साथ वेस्ट डी कंपोजर दवा की भी छिड़काव किया जाता है। इस तरह से खेत पुन: तैयार हो जाता है।