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अब पीलीभीत पैदा करेगा जैविक अमरूद

Thu, 03 Dec 2015 11:30 PM IST
plibhit
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धान, गेहूं और गन्ना की खेती में आ रही दिक्कतों और लागत के सापेक्ष मूल्य न मिलने से अब किसानों का रुझान परंपरागत खेती से हटने लगा है। खमरिया पट्टी गांव में इसका एक नमूना देखने को मिला है। यहां पेशे से एक चिकित्सक जैविक अमरूद उगाने की पहल की है।
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फसलों में रसायनिक के लगातार प्रयोग से मनुष्य में तमाम तरह की बीमारियां पनप रही हैं। इसके चलते पेशे से होम्यापैथिक चिकित्सक शहर के मोहल्ला खकरा निवासी डॉ. विकास वर्मा ने जैविक खेती करने का निश्चय किया और कृषि विभाग के अधिकारियों व कृषि वैज्ञानिकों से जानकारी जुटाई। विभागीय अधिकारियों व कृषि वैज्ञानिकों की सलाह पर उन्होंने कभी पीलीभीत की पहचान रहे अमरूद का बाग लगाने की योजना तैयार की है। खेती करने से पहले उन्होंने बरेली रोड पर पड़ने वाले खमरिया गांव में अपनी पांच एकड़ जमीन से रसायनिक उर्वरकों का असर खत्म करने को परती (खाली) छोड़ा। इसके बाद उन्होंने इस जमीन में छत्तीसगढ़ के रायपुर से लाए गए अमरूद के एल-49 प्रजाति के पौधे रोपित किया। डॉ. वर्मा ने बताया कि पांच एकड़ में करीब 1500 पौधे लगाए हैं। तीन साल में इसमें फल आना शुरू हो जाएगा। डॉ. वर्मा की मानें तो उन्होंने खेत में अब तक किसी भी प्रकार की खाद, रसायनिक और स्प्रे आदि का प्रयोग नहीं किया है।

सहफसली के रूप में उगा रहे मटर
अमरूद की पौध लगाने के बाद बीच में खाली बचे स्थान में फिलहाल मटर की फसल उगाई जा रही है। डॉ. वर्मा के अनुसार अमरूद तैयार होने तक कम से कम तीन साल तक सह फसली के रूप में आलू, मटर एवं अन्य फसलें उगाई जाएंगी। इसके साथ ही कुछ भाग में मूली, गाजर, शलजम आदि भी उगाया है।
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सोलर पैनल से हो रही सिंचाई
डॉ. वर्मा का फार्म आधुनिक तकनीक से युक्त है। जहां खेत के चारों ओर तार फेंसिंग की गई है वहीं सिंचाई के लिए कृषि विभाग से अनुदान पर सोलर पंप लगाया गया है। अमरूद एवं अन्य फसलों में सोलर पंप से ही सिंचाई की जा रही है, जिससे डीजल का पैसा बचने के साथ ही प्रदूषण पर भी अंकुश लगा रहा है।
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जैविक अमरूद उत्पादन की पहल एक अच्छी शुरूआत है। किसानों को अधिक लाभ कमाने के लिए परंपरागत खेती का मोह त्यागकर आधुनिक ढंग से खेती पर विचार करना चाहिए।
एके सिंह, उपनिदेशक कृषि
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