हर किसी के इरादे उनके कद से कहीं ज्यादा ऊंचे होते हैं। उनके कुछ सपने होते हैं जिसे वह पूरा करना चाहते हैं। जिले के वह होनहार युवा जो खेल में रुचि रखते हैं और वे अपने सपने पूरा करना चाहते हैं, उनके सपने जिले के इकलौते गांधी स्टेडियम में पहुंचते ही दम तोड़ने लगते हैं। वजह, स्टेडियम में संसाधनों की कमी और लक्ष्य प्राप्ति में सहायक बनने वाले कोच का न होना है। यही वजह है कि यहां की प्रतिभाएं निखरने पहले की दम तोड़ रहीं हैं।
स्टेडियम की स्थिति
शहर में वर्ष 1986 में 11 एकड़ भूमि पर स्टेडियम की स्थापना की गई थी। यहां आउटडोर गेम के रूप में एथलेटिक्स ट्रैक, क्रिकेट मैदान, हाकी, फुटबाल और वॉलीबाल मैदान मौजूद हैं। इंडोर गेम के नाम पर एक जिम है। वर्ष 1992 में बहुउद्देशीय क्रीड़ा हाल बनाया गया था। इसमें बैडमिंटन और टेबिल टेनिस की व्यवस्था की गई है। यहां तरणताल भी है।
कोच की स्थिति
खेल कोच की संख्या
- फुटबाल 1
- हाकी 1
- वेटलिफ्टिंग 1
- क्रिक्रेट 0
- बॉलीबाल 0
- बैडमिंटन 0
- टेबिल टेनिस 0
सुविधाओं के नाम पर सिर्फ मैदान
स्टेडियम में जिन खेलों के कोच हैं, उसी खेल से संबधित खिलाड़ियों को खेल संसाधन उपलब्ध कराए जाते हैं। क्रिकेट, बॉलीबाल, बैडमिंटन, टेबिल टेनिस से जुड़े खिलाड़ियों को यहां संसाधन के नाम पर मात्र मैदान ही मिलता है।
पर्याप्त बजट न मिलना बना रोड़ा
स्टेडियम में प्रतिमाह करीब एक लाख रुपये खर्च किए जाते हैं। इसमें क्रीड़ाधिकारी समेत अन्य स्टाफ की सेलरी और कुछ संसाधनों की खरीद फरोख्त हो पाती है। शासन से पर्याप्त बजट न मिलने के कारण स्टेडियम में कोच की नियुक्ति नहीं हो पा रही है। इस कारण खेल प्रतिभाओं का रुझान खेलों की ओर से हटता जा रहा है।
कम से संसाधन पूर्ति करना मुश्किल
क्रीड़ा अधिकारी का स्थानांतरण हो चुका है, बरेली के क्षेत्रीय क्रीड़ा अधिकारी को यहां का चार्ज दिया गया है। स्टेडियम में स्टाफ की भारी कमी है। फिलहाल स्टेडियम की व्यवस्था दुरुस्त रखने का पूरा प्रयास किया जा रहा है।
- केपी सिंह, लिपिक, गांधी स्टेडियम