कुदरत का लिखा भला कौन टाल सकता है। गुमनामी की मौत के बाद आज भी ‘अपनों’ का इंतजार ‘पोटली’ में बंधेे कपड़े कर रहे हैं। जनवरी 2010 से अब तक ऐसी मौत रेलवे स्टेशन पर 16 लोगों की हो चुकी है। जिनमें आठ भिखारी और आठ अन्य ट्रेन हादसों का शिकार हो चुके हैं। सभी की मौत के बाद जीआरपी उनका नाम-पता जानने के लिए 72 घंटे तक इंतजार किया। जब उनकी पहचान नहीं हो सकी तो उनका पोस्टमार्टम कराने के बाद अंतिम संस्कार कर दिया।
उम्र दराज लोगों को जब कोई सहारा नहीं देता तो उनमे से कुछ धार्मिक स्थल मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा आदि की चौखट पर पहुंच जाते हैं। जबकि कुछ रेलवे जंक्शन व बस अड्डे आदि का सहारा लेते हैं। समाज में कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो अपने बुजुर्गों को खुद इन स्थानों पर छोड़ जाते हैं।
बुजुर्ग भी अपना नसीब ऊपर वाले पर छोड़ लावारिसों की तरह भीख मांग कर पेट भरने व सिर छिपाने के लिए रुक जाते हैं। पिछले पांच सालों में भीख मांग स्टेशन पर गुजर बसर करने वाले आठ लोगों की मौत हो चुकी है। इसके अलावा आठ अन्य लोग रेलवे स्टेशन पर गुमनामी की मौत मर चुके है।
जिनका अंतिम संस्कार उनके धर्र्मों के अनुुसार जीआरपी ने 72 घंटे के इंतजार के बाद करवा दिया। शिनाख्त के लिए उनके कपड़ों की बंधी ‘पोटली’ थाने में आज भी टंगी है।
कपड़ों को आज भी है शिनाख्त का इंतजार
2010 से अब तक गुमानामी से 16 लोगों की ट्रेन हादसों में मौत हो चुकी है। जिनका अभी तक पता नहीं चल सका। इनमें आठ भीख मांगने वाले व आठ अन्य लोग शामिल है। पोटली में बंधे कपड़े आज ‘अपनो’ का इंतजार कर रहे।
पिछले पांच साल में ट्रेन हादसों का शिकार हुए
वर्ष संख्या
2010 4
2011 6
2012 1
2013 4
2014 1
2015 0
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अभी तक किसी की नहीं हुई शिनाख्त
ट्रेन हादसों में पांच सालों में 16 लोगों की मौत के बाद शिनाख्त के लिए उनके कपड़े पोटली में बांधकर जीआरपी थाने में टांग दिए गए, लेकिन अभी तक किसी की शिनाख्त नही हो सकी।
72 घंटे बाद होता है अंतिम संस्कार
जीआपी ने बताया की अज्ञात लोगाें की मौत के 72 घंटे बाद अंतिम संस्कार किया जाता है। जिसके लिए रेल विभाग 1500 सौ रुपये देता है कम पड़ने पर जीआरपी खर्च उठाती है। जनवरी 2015 से अब तक ऐसी किसी की मौत नही है। पहले जिन लोगाें की मौत हो चुकी है उनकी शिनाख्त के लिए उनके कपड़े संभाल रख लिए गए है।
- राघवेंद्र प्रताप सिंह, एसओ जीआरपी