चैत्र नवरात्र 21 मार्च से शुरू होने जा रहे हैं। इसकोे लेकर शहर समेत जिले
भर के देवी मंदिरों का सजाया संवारा जा रहा है। पर्व को लेकर एक दिन पूर्व
बाजार में काफी चहल पहल देखी गई। घरों में लोग पूजापाठ की तैयारियों में
जुटे रहे।
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मां यशवंतरी के दर्शन बिना पूरी होती पूर्णागिरि यात्रा
शहर
का मां यशवंतरी मंदिर सिद्धपीठ के रूप में दूर-दूर तक प्रसिद्ध है। यहां
पर बाहरी जिलों से भी बड़ी तादाद में श्रद्धालुओं को आना जाना रहता है। कहा
जाता है कि यहां राजा बेन की नौ संतानों में यशंवतरी देवी ने यहां नकटा
दानव का वध किया था। तभी से इस स्थान का नाम मां यशवंतरी देवी पड़ा।
मान्यता है कि मां यशवंतरी के दर्शन किए बिना पूर्णागिरि दरबार की यात्रा
पूरी नहीं मानी जाती है।
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सर्व मनोकामना पूरी करता है महामातेश्वरी मंदिर
शहर
के प्रमुख देवी मंदिरों में महामातेश्वरी मंदिर लोगों के आस्था का केंद्र
है। इस मंदिर का निर्माण मां काली के उपासक व रानीखेत निवासी पंडित नरोत्तम
जोशी ने वर्ष 1969 की थी। बताते हैं कि पंडित नरोत्तम को स्वप्न में मां
ने मंदिर स्थापना के बात कही थी। इसके बाद यहां तमाम झंझावतों के बाद देवी
मां की स्थापना की गई। नवरात्र के दिनों में यहां पूरे नौ दिन श्रद्धालुओं
की भीड़ रहती है।
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आस्था का केंद्र है गोदावरी का मां दुर्गा मंदिर
शहर
की गोदावरी कॉलोनी स्थित मां दुर्गा मंदिर भी वर्षों पुराना है, लेकिन यह
मंदिर वर्ष 2002 में अस्तित्व में आया। पुजारी अशोक मिश्रा बताते हैं कि
यहां पहले तालाब हुआ करता था, ग्रामीण यहीं पूजापाठ करते थे। इसके बाद
कालोनी बसने के दौरान इसका जीर्णोद्धार कराया गया। नवरात्र पर्व पर यहां भी
कालोनी के अलावा दूर दराज से आए लोग मां के दर्शन कर मनौती मांगते हैं।
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ऐसे करें घट स्थापना
चैत्र
की प्रतिपदा तिथि से नवरात्र शुरू किए जाते हैं। नवरात्र का आरंभ प्रतिपदा
तिथि को कलश स्थापना से किया जाता है। पंडित नरायनस्वरूप शर्मा बताते हैं
कि कलश स्थापना को कलश में गंगाजल से भरना चाहिए और उसमें पंचरत्न और
पंचपल्लव (आम के पत्ते) डालने चाहिए। कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त सुबह 7.41
बजे से 9.11 बजे तक का है।
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माता के नौ दिन में यह करें
- प्रतिदिन मंदिर जाकर पूजा अर्चना करें
- देवी मां को जल अर्पित करें
- नौ दिनों तक देवी का विशेष श्रृंगार करें
- मां की अखंड ज्योति प्रज्ज्वलितद करें
नौ दिन में यह न करें
- लहसुन-प्याज का भोजन न बनाए
- छौंक या बघार नहीं लगाएं।
- व्रतधारी बाहर जाने से बचें।