खोदाई से टीले पर संक्रमणीय भूमिधर में दर्ज किसानों के खेतों को तालाब बना दिया गया। खोदाई के समय टीले से निकल रहीं पुराने समय की ईंटों और मिट्टी के बर्तनों के अवशेष भी नजरंदाज कर दिए।
बरेली-सितारगंज हाईवे के निर्माण की आड़ में जहानाबाद क्षेत्र का ऐतिहासिक बिलईखेड़ा टीला खनन की भेंट चढ़ गया। इसकी एनओसी खनन विभाग ने दी और एनएचएआई की कार्यदायी संस्था ने 15 फुट से अधिक गहराई में खनन कर दिया। नियमोंं की ऐसी धज्जियां उड़ाईं कि टीले पर संक्रमणीय भूमिधर में दर्ज किसानों के खेतों को तालाब बना दिया। खोदाई के समय टीले से निकल रहीं पुराने समय की ईंटों और मिट्टी के बर्तनों के अवशेष भी नजरंदाज कर दिए। मामले में जब शिकायत हुई तब टीले पर खनन की रफ्तार थमी, लेकिन चोरी छिपे काम अभी चालू है।
विज्ञापन
टीले की जमीन जहानाबाद कस्बे में बिलई मोहल्ले से सटी है और कई किसानों के नाम पर संक्रमणीय भूमिधर श्रेणी में दर्ज है। बरेली-पीलीभीत-सितारगंज हाईवे का निर्माण शुरू हुआ तो टीला भी इसकी जद में आ गया। भूमि अधिग्रहण के बाद टीले को खोदकर हाईवे निकाला गया। यही नहीं निर्माण करा रही आरपीएल कंपनी ने टीले के ऊपर खेती करने वाले किसानों की जमीन भी ले ली और फिर उसमें भी खनन हुआ।
खनन का यह खेल हाईवे से काफी दूर तक चला। टीले पर खेती करने वाले किसानों के खेतों को तालाब बना दिया गया। हालांकि, खनन अधिकारी का अलग ही तर्क है। उनका कहना है कि कंपनी ने अलग-अलग गाटा संख्या की अनुमति ली थी और करीब तीन मीटर तक खनन करते हैं। अनुमति कितने गाटा संख्या की ली, इसकी जानकारी उन्हें नहीं है।
विज्ञापन
बिलईखेड़ा टीला
- फोटो : अमर उजाला
शिकायत के बाद डीएम ने लगाई रोक, एएसआई को पत्र लिखा
बिलईखेड़ा टीले पर हो रहे खनन के मामले में सामाजिक कार्यकर्ता एडवोकेट शिवम कश्यप ने 28 जनवरी को डीएम से शिकायत की। टीले के पुरातात्विक महत्व के बारे में बताया और सर्वे होने तक खनन पर रोक लगाने की मांग की। इसके बाद डीएम ने खनन रोकने के निर्देश दिए और सर्वे के लिए पुरातत्व विभाग को पत्र भेजा है।
कनिंघम की 1862-83 की रिपोर्ट में है इस स्थान का जिक्र
सामाजिक कार्यकर्ता ने डीएम को शिकायती पत्र के साथ ही कनिंघम रिपोर्ट की कॉपी भी दी। इस रिपोर्ट- 1862-63 में बिलईखेड़ा (बलईखेड़ा) के टीले का जिक्र है। इसमें लिखा है कि जहानाबाद-पीलीभीत बिलईखेडा टीले की ऊंचाई करीब 20 फुट है। इसमें पेड़, पुराने मंदिर और अन्य बातों का भी जिक्र किया गया है। पुरातत्वविद राजीव त्रिवेदी के अनुसार कनिंघम की सर्वे रिपोर्ट में पुरातात्विक महत्व के स्थानों का उल्लेख होता है।
खोदाई में निकल रहीं ईंटें और मिट्टी के बर्तन
खोदाई के समय निकल रहीं पुरानी ईंटें और मिट्टी के बर्तन गवाही दे रहे हैं कि टीला काफी पुराना है। टीले पर खोदे गए खेतों में हर जगह ईंटें और बर्तनों के अवशेष नजर आ रहे हैं। इसके बाद भी खनन विभाग और तहसील प्रशासन बेखबर बना हुआ है।
टीले की जमीन संक्रमणीय भूमिधर में दर्ज है। एनएचएआई की ओर से अनुमति ली गई थी। करीब तीन मीटर खोदाई कर सकते हैं। कुछ दिन पहले हमने और एसडीएम स्तर से भी जांच कराई है। कितने गाटा संख्या में खनन की अनुमति है, इसकी जानकारी नहीं है। - सुभाष, खनन अधिकारी
कार्य कराने वाली कंपनी ने पूर्व में अनुमति के अनुसार ही खनन किया। शिकायत के बाद से खनन रोक दिया गया है। 20 दिन से अधिक समय से खनन बंद है। पुरातत्व विभाग को पत्र भी भेजा गया है।- महिपाल सिंह, एसडीएम सदर
करीब 100 वर्ष उम्र हो गई है। बचपन से ही टीला देखते आए हैं। बुजुर्गों से कई किस्से भी सुने। मेहमानों को यहां पर घुमाने ले जाते थे। टीले को मिटाना अच्छा नहीं है। हमारी जमीन भी टीले पर है। कहा गया था, लेकिन हमने मिट्टी बेचने से मना कर दिया।- रामस्वरूप, बिलई
जब से समझने वाले हुए, तब से टीले को देखा है। 90 वर्ष से अधिक उम्र हो चुकी है। बुजुर्ग टीले पर एक पुराने पेड़ के नीचे खजाना होने के किस्से सुनाते थे। पूर्व में कई लोग जांच को भी आए। टीले का स्वरूप बिगड़ने का अफसोस हो रहा है।- नूर मोहम्मद, बिलई
पीलीभीत से जांच के लिए पत्र आया है। इस बारे में पड़ताल कराने के बाद ही कुछ कहा जा सकता है। विशेषज्ञों की टीम जो रिपोर्ट देगी, उसी के अनुसार प्रशासन को जानकारी दी जाएगी।-डाॅ.आफताब हुसैन, अधीक्षण पुरातत्वविद, लखनऊ मंडल