सपा ने यहां भले ही जिला पंचायत अध्यक्ष पद पर कब्जा जमा लिया हो, लेकिन
इसके लिए उसे साम, दाम, दंड भेद जैसे सभी काम करने पड़े।
यही नहीं इसके लिए
सपा को अपनी गुटबाजी तो खत्म करनी ही पड़ी साथ ही राह आसान करने के लिए
उसे 11 सदस्यों का मत प्राप्त करने के लिए प्रशासन का भी भरपूर सहारा लेना
पड़ा। इसके अलावा राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) हाजी रियाज अमहद व खाद्य
एवं रसद मंत्री हेमराज वर्मा को भी आपसी मतभेद भुला कर पूरी शिद्दत के साथ
जुटना पड़ा। तब कहीं सपा की नैया पार हो सकी।
जिला पंचायत सदस्य चुनाव
के जब परिणाम घोषित हुए तो भाजपा, मेनका गुट तथा बसपा सभी अपने-अपने पांच
से छह सदस्य बता रहे थे, लेकिन मेनका गुट को छोड़ अध्यक्ष पद के लिए कोई भी
सपा उम्मीदवार के सामने नामांकन कराने का साहस नहीं जुटा सका।
मेनका गांधी
की ओर से उनके पीआरओ रंजीत सिंह ने चुनाव अपने पक्ष में करने के लिए
तानाबाना बुना। वह जानते थे कि प्रत्याशी का पहले खुलासा कर देने पर सत्ता
पक्ष के लोग उस पर हावी होने में जुट जाएंगे लिहाजा नामांकन के दिन ही
उन्होंने आशा देवी का नामांकन करा पत्ते खोले।
हालांकि इस बीच सपा के दोनों
मंत्री अपनी लाज बचाने के लिए करीब 30 सदस्यों को अपने पाले में लाने में
कामयाब हो चुके थे, लेकिन इसके बाद भी मेनका गुट के लोगों ने उनमें से कई
सदस्यों पर अपना भी प्रभाव बनाना शुरू कर दिया था। इसमे वह कामयाब भी होते
दिखाई देने लगे, लिहाजा लाज बचाने के लिए राज्यमंत्री हेमराज व हाजी रियाज
जी जान से जुट गए। पूरे जिले की सपा की टीम भी लगाई गई।
इसके बाद भी क्रास
वोटिंग का भय सताता रहा, लिहाजा सपाइयों ने प्रशासन का सहारा लिया। इस कड़ी
में दो सदस्यों पर मुकदमा दर्ज कराने से लेकर 11 सदस्यों की वोटिंग के लिए
सहायकों की मंजूरी प्राप्त करने व उन्हीं के माध्यम से वोट डलवाने का काम
कराना पड़ा।
तब जाकर सपा की कहीं लाज बच पाई, लेकिन वोटिंग के दौरान मुलायम
सिंह यादव से लेकर राज्यमंत्री हेमराज वर्मा तक के खिलाफ लगे मुर्दाबाद के
नारे व विरोध प्रदर्शन व मीडिया को दूर रखने के काम ने भी इसे तार-तार कर
दिया।