फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

आपदा में अवसर... तिकड़मबाजी कर मनरेगा में सबको काम

विज्ञापन
दीनदयाल। - फोटो : PILIBHIT
विज्ञापन
पीलीभीत। मनरेगा में भले ही प्रवासियों या जॉब कार्डधारकों को काम न मिला हो, लेकिन सरकारी आंकड़ेबाजी में हर हाथ को रोजगार मिल गया। आंकड़ों पर नजर डाली जाए तो इस साल लॉकडाउन में भी 2.99 लाख जॉब कार्डधारकों में से 2.18 लाख ने मनरेगा में काम मांगा, इनमें से 1.51 लाख को काम मिला। इनमें विभिन्न राज्यों से विस्थापित होकर आए जिले के 10014 प्रवासी भी शामिल हैं। हालांकि यह आंकड़े किसी के भी गले नहीं उतर रहे हैं क्योंकि अधिकतर जॉब कार्डधारक ही यह कह रहे हैं कि उन्हें काम नहीं मिला।
विज्ञापन

जनपद में मनरेगा जॉब कार्ड धारकों की कुल संख्या 299866 है। सरकारी आंकड़ों पर गौर करें तो इनमें से 2.18 लाख ने रोजगार मांगा और 151781 को काम दिया भी जा चुका है। हालांकि हकीकत अधिकतर गांवों में मनरेगा जॉब कार्डधारक रोजगार मिलने से स्पष्ट तौर पर इनकार कर रहे हैं।
काम तो दूर, पुराना भुगतान तक नहीं मिला
जॉबकार्ड धारकों की मानें तो उन्हें वर्षों से मांगने के बाद भी मनरेगा में काम नहीं मिला। यहां तक कि मनरेगा में कराए गए पुराने कामों के भुगतान भी नहीं कराए गए। परिवार का गुजर बसर करने के लिए वह ईंट भट्ठे पर मजदूरी करते हैं। तमाम मनरेगा जॉब कार्डधारक काम न मिलने पर रोजगार की तलाश मेें दोबारा परदेस चले गए। अब गांवों में सार्वजनिक शौचालय निर्माण चल रहा है तो उनमें ठेकेदार दूसरे गांव के श्रमिक रोजाना की मजदूरी पर लगाकर काम कराते हैं। मनरेगा जॉब कार्डधारकों की ब्लॉक से लेकर मुख्यालय तक सुनवाई नहीं है। ग्राम पंचायतों में मनरेगा कामों में सबसे बड़ी लापरवाही जॉब कार्ड भरने को लेकर है। जॉब कार्ड बनने के बाद श्रमिकों से कराए गए काम और दिन का विवरण नहीं भरा जाता। जॉब कार्ड मात्र कागज का टुकड़ा बनकर रह गए हैं। अमर उजाला ने शनिवार को मनरेगा की हकीकत परखने के लिए कुछ गांवों में जाकर जॉब कार्ड धारकों से बात की। प्रस्तुत है एक रिपोर्ट।
विज्ञापन

सीन एक:
ग्राम पंचायत कैम
मुख्यालय से सात किलोमीटर दूर ग्राम पंचायत कैम में मनरेगा के 450 जॉबकार्ड धारक हैं, इनमें 200 से अधिक सक्रिय हैं। प्रधान रमेश चंद्र मिश्र, पंचायत सचिव राजाराम के अनुसार ग्राम पंचायत के मजरा सिकलापुर और गुर्ज गौटिया में बहुत सा काम मनरेगा से ही कराया गया। उसमें बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार मिला। हालांकि दोनों रोजगार मिलने वाले श्रमिकों की संख्या नहीं बता पाए। मजरा गुर्ज गौटिया में ग्रामीणों से बात की गई तो जॉब कार्ड धारक बोले- उन्हें वर्षों से मनरेगा में काम नहीं मिला। एक जॉब कार्डधारक ने बताया कि चंद दिन काम किया था, उसका पैसा नहीं मिला। काम का विवरण भी जॉब कार्ड पर नहीं लिखा गया।
सीन दो:
ग्राम पंचायत देवीपुरा
मरौरी ब्लॉक की ग्राम पंचायत देवीपुरा में पेड़ के नीचे बैठे ग्रामीणों से जब मनरेगा में रोजगार मिलने के बारे में बातचीत की तो सभी ने अपना दर्द बयां किया। बोले- जॉब कार्ड अधूरे भरे हैं। वर्षों से मनरेगा में काम नहीं मिला। एक जॉब कार्डधारक ने कहा कि चंद दिन काम किया तो मजदूरी नहीं मिली। सभी ठेकेदार को कई काम दे दिए गए। प्रवासी श्रमिक बोले- वह रोजगार के लिए भटकते रहे, मगर काम नहीं मिला। ग्रामीणों ने ये भी बताया कि गांव में मनरेगा से होने वाले काम का पता ही नहीं लगता। दूसरे गांव की लेबर या ठेकेदारों से काम करा लिए जाते हैं। कुछ के जॉब कार्ड पर डिटेल नहीं भरी गई थी। 2008 से जॉब कार्ड धारक श्रमिकों के कार्ड में चंद दिनों की ही डिटेल थी।
सीन तीन:
ग्राम पंचायत सिंबुआ
बिलसंडा ब्लॉक की ग्राम पंचायत सिंबुआ में मनरेगा के 425 जॉब कार्ड धारक हैं। इनमें 150 सक्रिय हैं। 30 प्रवासियों के भी जॉब कार्ड बनाए गए थे। उनमें भी 15 सक्रिय हैं। शनिवार को मनरेगा के तहत आंगनबाड़ी केंद्र, सामुदायिक शौचालय और पशु शेड का निर्माण कार्य चल रहा था। कागजों में 28 मनरेगा श्रमिक काम पर दिखाए गए थे। मगर मौके पर जाकर देखा तो महज चार श्रमिक ही काम करते मिले। अन्य श्रमिकों के बारे में जानकारी की गई तो बड़ा खेल निकला। कागजों में 28 मनरेगा श्रमिक काम पर थे, जबकि हकीकत में सब काम ठेके से कराया जा रहा था। यहां भी जॉब कार्ड धारकों का भी यही कहना था कि उन्हें मनरेगा में काम नहीं मिला।
बोले ग्रामीण:
छह साल से नहीं मिला काम
2008 में मनरेगा का जॉब कार्ड बना था। शुरुआत में तो काम मिला, मगर छह साल से मनरेगा में काम नहीं मिला। लॉकडाउन में भी काफी परेशान था। कोई सुनने वाला नहीं है। - दीनदयाल, गुर्ज गौटिया
ईंट भट्ठे पर काम करने गए
तीन साल से भट्ठे पर काम करते हैं। फिर खेतों पर भी मजदूरी की। मनरेगा में कई बार काम मांगा, मगर प्रधान और सचिव ने काम न होने की बात कहकर टाल दिया। - मुनेश कुमार, गुर्ज गौटिया
बोले... औरतों के लिए नहीं है काम
तीन साल से मनरेगा में कोई काम मुझे नहीं मिला। बीते साल मनरेगा में गांव के अंदर काम चला तो मांगने गए थे। रोजगार सेवक ने कह दिया कि औरतों को काम नहीं मिलता। बाहरी गांव की लेबर लगा दी गई। - रामबेटी, देवीपुरा
25 दिन की मजदूरी भी नहीं दी
लंबे समय बाद बीते साल नाला सफाई का काम मनरेगा में किया। 25 दिन काम करने के बाद भी मजदूरी नहीं दी गई। कई बार चक्कर लगाए, किसी ने कोई सुनवाई नहीं की। अब बीमार हूं। - सुम्मेरलाल, देवीपुरा
11728 प्रवासी लौटे, 10014 को काम मिला
कोरोना संकट काल में दूसरे प्रदेशों से लौटने वाले श्रमिकों के रोजगार देने को लेकर भी सरकारी आंकड़े कहीं से कमजोर नहीं हैं। हालांकि वह अलग बात है कि यह सब कुछ कागजों पर ही है। अगर यही जमीन पर होता तो तस्वीर हकीकत से बहुत से बेहतर होती। आंकड़ों की बात करें तो लॉकडाउन में कुल 699 ग्राम पंचायतों में 11728 प्रवासी घर वापस आए। इनमें से 10014 प्रवासियों को मनरेगा में रोजगार भी दे दिया गया।
मनरेगा के तहत जॉब कार्डधारकों को साल में 100 दिन काम दिलाने का पूरा प्रयास रहता है। लॉकडाउन में बाहर से आए प्रवासियों को भी काम दिलाया गया। अगर कहीं कोई कमी है तो उसे दिखवाया जाएगा। - श्रीनिवास मिश्र, सीडीओ

रामबेटी।- फोटो : PILIBHIT

 

सुमेरलाल।- फोटो : PILIBHIT

 

गुर्ज गौटिया गांव के श्रमिक के जॉब कार्ड में नहीं भरा काम का कोई विवरण।- फोटो : PILIBHIT

 

बिलसंडा के सिंबुआ गांव में मनरेगा के तहत चल रहा निर्माण कार्य।- फोटो : PILIBHIT

 

देवीपुरा ग्राम पंचायत में काम न मिलने पर रोष जताते मनरेगा जॉब कार्डधारक।- फोटो : PILIBHIT

 

विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें