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जकात और सदका की तरह है कुर्बानी

Fri, 01 Sep 2017 11:07 PM IST
पीलीभ्ाीत ब्यूराो
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श्‍ाा‌िजजिद हसनी
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 मुस्लिम धर्म गुरु इस्लामिक स्कालर मुफ्ती साजिद हसनी ने कहा कि इस्लाम में कुर्बानी का जिक्र बाबा आदम अलैहिस्सलाम के जमाने से मिलता है। बुनियादी तौर पर हजरत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के जमाने से इस्लाम में कुर्बानी एक इबादत की हैसियत रखती है। इबादत जितनी भी हैं वह सब बंदे का अल्लातआला से ताल्लुक (कुर्ब) का इजहार होता है। जैसे बंदे की बंदगी नमाज है और माल से इबादत करने का इजहार जकात और सदका है, ठीक इसी तरह कुर्बानी भी है। मुस्लिम समुदाय में साल में दो ही त्योहार मजहबी तौर पर मनाए जाते हैं। ईद-उल-फितर और दूसरी इद-उल-अजहा। कुर्बानी का लफ्ज कुर्ब से बना है। इसका मतलब करीब होना है। ईद-उल-अजहा पर अपने जानवरों को कुर्बान करने का मकसद अल्लातआला से कुर्ब हासिल करना होता है। यानी अल्लाह तआला से अपनी नजदीकियां बढ़ाना होता है। लाखों की कीमत का बकरा खरीदने की बजाय कम कीमत का बकरा खरीदकर कुर्बानी दी जा सकती है। बाकी बची रकम से गरीबों और फकीरों की मदद की जानी चाहिए। इस्लाम कुर्बानी के साथ-साथ गरीबों जरूरतमंदों और फकीरों की मदद करने का हुक्म देता है। जो शख्स मालिके निसाब हो यानी जिसके पास साढ़े 52 तोले चांदी या साढ़े सात तोला सोना हो या उसके बराबर किसी के पास रकम हो चाहे वह मर्द हो या औरत तो कुर्बानी करना वाजिब है।
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उन्होंने कहा कि कई जगह इस बार कुछ इंसानियत और अमन के दुश्मन लोग और संगठन कुर्बानी के दौरान अमन और अमान खराब करने की कोशिश कर सकते हैं, लिहाजा सब्र से काम लें और मुल्क के कानून का सम्मान करते हुए इसका पूरा पालन करें। किसी को आपकी वजह से कोई परेशानी नहीं होना चाहिए, क्योंकि हम मुसलमान हैं। अमन-अमान कायम रखने की जिम्मेदारी हमारी है। उन्होंने लोगों को ईद की मुबारकबाद पेश की।
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