पीलीभीत। जिले के कई मूकबधिरों ने अपनी दिव्यांगता को मात देकर मेहनत और लगन से सफलता की कहानी गढ़ी है। शहर निवासी युवक ने सांकेतिक भाषा से पढ़ना, लिखना सीखा और मुकाम हासिल किया। मौजूदा समय में युवक मध्य प्रदेश में आर्डिनेंस फैक्टरी में नौकरी कर रहा है। वेतन भी काफी अच्छा है। वहीं, बीसलपुर निवासी युवक ने खुद की टेलरिंग शॉप खोल ली। खुश मिजाज युवक के पास पूरे साल काम रहता है।
मूक बधिर उदय ने औद्योगिक क्षेत्र में बनाया मुकाम
शहर के मौर्या मार्केट निवासी उदय गंगवार ने मेहनत और लगन से औद्योगिक क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई है। उनके पिता श्रीकृष्ण गंगवार एक सामान्य कृषक परिवार से आते हैं। प्राथमिक शिक्षा उन्होंने कक्षा छह से आठवीं तक बरेली के राजकीय मूकबधिर विद्यालय से पूरी की। इसके बाद 9-10वीं की पढ़ाई यूपी बोर्ड से और तकनीकी शिक्षा राजकीय आईटीआई पीलीभीत से हासिल की। तकनीकी शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने औद्योगिक क्षेत्र में कदम रखा और वर्तमान समय में आर्डिनेंस फैक्ट्री (डिपार्टमेंट ऑफ डिफेंस चार्ज), इटारसी मध्य प्रदेश में सेवाएं दे रहे हैं। उदय गंगवार की सफलता क्षेत्र के युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है। उनका मानना है कि समर्पण और निरंतर प्रयास से हर युवा अपनी मंजिल पा सकता है।
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तीन दशकों से टेलरिंग कर रहे मूकबधिर महेंद्र
बीसलपुर। नगर के मोहल्ला दुबे में रहने वाले मूकबधिर पिछले तीन दशकों से कपड़ों की सिलाई का कार्य कर रहे हैं। अनपढ़ होने के कारण वह अपने ग्राहकों का विवरण लिख नहीं पाते बल्कि अपने दिमाग में ही रखते हैं। वह अपने ग्राहकों से इशारों में ही बातचीत करते हैं।
मोहल्ला निवासी जयदेवी शंखधर बताती हैं कि उनका पुत्र महेंद्र कुमार (51) जन्म से ही मूकबधिर है। पूरी तरह से अशिक्षित हैं। वह 21 वर्ष की आयु से सिलाई का कार्य करने लगे थे। उसका ग्राहकों के साथ काफी अच्छा व्यवहार रहता है। अपने पास आने वाले सभी ग्राहकों को उचित अभिवादन करना नहीं भूलता। इशारे से उनकी बात समझता है और ग्राहकों की मर्जी के मुताबिक उनके कपड़े सिलकर दे देता है। महेंद्र की एक आदत यह भी है कि वह ग्राहकों को उनके सिले हुए कपड़े निर्धारित समय में देता है। वह काफी हंसमुख मिजाज है। जयदेवी बताती हैं कि सिलाई का काम निपटाने के बाद वह घरेलू कार्यों में पूरी मदद करता है। महेंद्र की मां कहती हैं कि उन्होंने बेटे का विवाह कराने का प्रयास किया लेकिन उसने मना कर दिया। नौ साल पहले पिता का निधन हो गया था। इसके बाद महेंद्र काफी दिनों तक परेशान रहा। संवाद
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