बहुजन समाज ने प्रतिष्ठा का सवाल बनी बीसलपुर विधान सभा सीट से अपना प्रत्याशी घोषित कर दिया है। राम लहर में केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी को संसदीय चुनाव में शिकस्त देने वाले परशु गंगवार की विवाहित पुत्री दिब्या सिंह गंगवार को शनिवार को अपना प्रत्याशी घोषित कर दिया। बसपा ने ऐसा कर एक तीर से कई निशाने साधने का जहां प्रयास किया है वहीं उसे उम्मीद है कि कुर्मी व दलित वोटों के सहारे बसपा यहां कब्जा जमा सकती है।
बहुजन समाज पार्टी के लिए जिले की बीसलपुर विधान सभा सीट ही सबसे मजबूत मानी जाती रही है। पूर्व मंत्री अनीस अहमद उर्फ फूल बाबू बसपा टिकट पर तीन बार विधायक चुने जा चुके हैं। वह प्रदेश सरकार में मंत्री भी रहे। उनकी गिनती जिले के वरिष्ठ मुस्लिम नेताओं में भी की जाती है, लिहाजा इसका लाभ भी बसपा को मिलता रहा है। जिले के अब तक के इतिहास में बसपा से जो दो विधायक (अनीस अहमद खां और अरशद खां) चुने गए वह दोनों मुस्लिम ही रहे। इससे साफ है कि बसपा यहां जब भी सफलता मिली उसके पीछे दलित और मुस्लिम वोटों के गठजोड़ रहा है। बसपा में रहते हुए फूल बाबू का भी कद काफी बढ़ चुका था। लिहाजा उनमे और बसपा महासचिव नसीमुद्दीन सिद्दीकी में भी बर्चस्व की लड़ाई 2012 के विधान सभा चुनाव से पहले ही शुरू हो गई थी। लिहाजा 2012 के विधान सभा चुनाव में पार्टी ने फूल बाबू का टिकट काट दिया। जिसके चलते यह सीट बसपा से भाजपा ने छीन ली। फूलबाबू कांग्रेस से यहां चुनाव लड़े थे और दूसरे नंबर पर रहे थे। आवश्यकता महसूस होने पर लोक सभा चुनाव में फिर बसपा ने फूलबाबू को वापस बुला लिया लेकिन नसीमुद्दीन और फूलबाबू में बर्चस्व की लड़ाई खत्म नहीं हुई। लिहाजा कुछ माह पहले बसपा ने फिर नसीमुद्दीन को बाहर का रास्ता दिखा दिया। बसपा के लिए यह सीट किसी प्रतिष्ठा से कम नहीं है। यही वजह है कि बसपा यहां राजनीतिक पृष्टिभूमि के साथ-साथ जातीय गणित में फिट बैठने वाले प्रत्याशी की तलाश में थी। बीसलपुर में कुर्मी मतदाताओं की संख्या ठीक ठाक है। दिब्या सिंह गंगवार के पिता डा. परशुराम गंगवार की गिनती एक समय में जिले के बड़े कुर्मी नेताओं में की जाती थी। जिसकी बदौलत वह एक बार भाजपा टिकट से यहां केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी को हराकर संासद भी चुने गए थे। करीब एक साल पहले उनका निधन हो गया था। बसपा ने उनकी पुत्री दिब्या गंगवार को प्रत्याशी बनाया है। दिब्या के पति मुख्यरूप से मेरठ के रहने वाले हैं और पीलीभीत, लखीमपुर समेत कई जिलों में प्रापर्टी का कारोबार करते हैं। दिब्या समाजिक सेवा के कार्य करती हैं। परिवार में उनके एक जेठ जहां सपा से विधायक हैं वहीं फुफेरे भाई राज्यसभा सदस्य। कुल मिलाकर राजनीतिक रूप से भी दिब्या मजबूत हैं। उनके पिता के समय के तमाम भाजपा नेता व कार्यकर्ता भी उनके संपर्क में हैं। बसपा का मानना है कि परशुराम की पुत्री होने का भी लाभ उन्हें मिलेगा। कुल मिलाकर बसपा का यह गणित प्रतिष्ठा की सीट पर कहां तक सटीक बैठेगा यह कहना अभी मुश्किल है, लेकिन बसपा ने दिब्या को यहां से मैदान में उतार एक तीर से कई निशाने साधने की कोशिश जरूर की है।