पीलीभीत। कोरोना वायरस से बचाव के लिए आम नागरिक तो घर में हैं। डॉक्टरों के अलावा स्वास्थ्य विभाग का स्टाफ भी पूरी शिद्दत से उनके इलाज में लगा है। मगर, डॉक्टर और उनका सहयोगी स्टाफ दो सप्ताह पहले मिली फटा एप्रन और पुराने मास्क लगाकर ही स्क्रीनिंग और इलाज कर रहा है। इससे उन्हें कोरोना से संक्रमित होने का डर सता रहा है।
शासन कोरोना वायरस के संक्रमण से बचाव के लिए तीन से चार किस्तों में 17 करोड़ से ज्यादा का बजट दे चुका है। इस बजट से पीड़ितों को खाना, रहने के इंतजाम के अलावा स्वास्थ्य विभाग के उपकरण और मास्क, सैनिटाइजर बगैरह ही खरीदना है। अब तक सरकार से मिला बजट खर्च होता नहीं दिख रहा है। आश्रय स्थलों पर भोजन के पैकेट तो समाजसेवी और सामाजिक संस्थाएं बांट रही हैं, कम्यूनिटी किचन भी इनकी आड़ में ही चल रहे हैं। बीच में यह दावा किया गया था कि शासन से दैवी आपदा राहत कोष में मिले बजट से स्वास्थ्य उपकरण खरीदे जाएंगे। मगर, कोरोना के शोर के बीच शासन से मिले बजट को मनमाने तरीके से निपटाने पर भी अफसरों की नजर लग गई है।
स्वास्थ्य विभाग के डॉक्टरों का कहना है कि कोरोना से जंग लड़ने के लिए उनके पास एन-95 मास्क, थ्री लेयर मास्क, पीपीई किट और अन्य जरूरी सामान स्टॉक में हैं। वहीं बाहर से आए संदिग्धों की स्क्रीनिंग करने में मास्क रोज बदले जाने चाहिए, मगर ऐसा हो नहीं रहा। डॉक्टर और उनका सहयोगी स्टाफ दो या तीन हफ्तों से एक ही मास्क प्रयोग करके खतरे मोल ले रहा है। उन्हें नए मास्क रोजाना मिल नहीं रहे हैं। दूसरे प्रांतों से आए आठ हजार से ज्यादा लोगों की स्क्रीनिंग करने के लिए स्वास्थ्य विभाग की प्रत्येक ब्लॉक में दो टीमें लगी हुई हैं। मगर, इनके पास फटा एप्रन और पुराने मास्क ही हैं, जो दो या तीन सप्ताह पहले इन्हें दिए गए थे। मगर, अफसरों के डर की वजह से स्वास्थ्य टीम के सदस्य दबी जुबान से यह सब बताकर अपने परिवार के प्रति चिंतित हैं। कोरोना से जंग लड़ने के लिए सबसे अगली पंक्ति में खड़े स्वास्थकर्मी फटा-पुराना एप्रन और पुराने मास्क के सहारे संग्दिधों की स्क्रीनिंग करते हुए संक्रमण के प्रति हर समय खतरे में रहने की बात कह रहे हैं। हालांकि, इन पर दबाव इतना है कि वह कह कुछ नहीं पा रहे हैं।
मंगलवार को कोरोना संदिग्धों की जांच में जिला क्षय रोग की टीम को भी लगाया गया है। इस टीम में शामिल सीनियर ट्रीटमेंट सुपरवाइजर (एसटीएस) राजेश गंगवार ने टीम के साथ शहर के एक मोहल्ले में संदिग्धों की स्क्रीनिंग की। उनके चहेरे पर फटा एप्रन, पुराने ग्लब्स और गंदे मास्क लगे थे। उनसे जब नए मास्क के बारे में पूछा गया तो वह कुछ नहीं बोले। मगर, इतना जरूर कहा कि मास्क रोजाना बदलने चाहिए। मगर, नए मिल नहीं रहे तो क्या करें। 00
जान जोखिम में डाल 1000 से अधिक संदिग्धों की कर चुके जांच
एसटीएस राजेश ने सुरक्षा किट के बारे में बात की तो इनकी आंखें नम हो गईं। बोले- यह एप्रन उनकी अपनी है। स्वास्थ्य विभाग से उन्हें मात्र एक ही मास्क मिला था। वह भी दो-तीन सप्ताह पहले। 15 दिन पुराने मास्क से संक्रमण फैलने का हर समय खतरा रहता है। अफसरों से कई बार कहा, लेकिन उन्हें टरका दिया गया। जुझारू स्वास्थ्य कर्मी राजेश भी अव्यवस्थाओं के बावजूद डटे हैं। अब तक दूसरे प्रांतों से आए 551 और होम क्वारंटीन किए गए 487 से अधिक संदिग्धों की स्क्रीनिंग कर चुके हैं।
परिवार की चिंता सताती है
एसटीएस राजेश कहना है कि स्क्रीनिंग करते समय उन्हें परिवार और दोस्तों की चिंता सताती है, लेकिन जब वह सुबह घर से निकलते हैं तो सिर्फ कामपर ही ध्यान रहता है। उनका मकसद रहता है कि अधिक से अधिक लोगों की स्क्रीनिंग कर अपने विभाग को रिपोर्ट दूं। देश सेवा में उनका योगदान किसी से कम ना रहे। पुराने मास्क या एप्रिन से एसटीएस राजेश ही नहीं, बल्कि टीमों में शामिल फ्रंटलाइन अन्य वर्कर भी परेशान और भयभीत हैं। अफसरों का बजट ठिकाने लगाने का यह तरीका तमाम स्वास्थ्य कर्मियों की जिदंगी से खिलवाड़ करता दिख रहा है।
स्वास्थ्य टीम में शामिल डॉक्टरों और अन्य स्वास्थ्य कर्मियों को पैरासिटामॉल टैबलेट, मास्क और ग्लब्स दिए गए हैं। स्क्रीनिंग के दौरान मरीजों से निर्धारित दूरी पर खड़े होकर जांच करने को कहा गया है। जहां जरूरत होती है वहां नए मास्क भी दिए जाते हैं। -डॉ. सीमा अग्रवाल, सीएमओ