मोहर्रम के उपलक्ष्य में दरगाह शाहजी मियां पर तरही मुशायरे का आयोजन किया गया। इसकी सदारत सज्जादानशीन मुन्ने मियां और निजामत उसमान खां रजी ने किया। मुशायरे का आगाज हाफिज कारी मौलाना मोहम्मद असद ने तिलावते कुरान-ए-पाक से किया।
उस्ताद शायर मकबूल हुसैन फैज ने कहा -
जालिस से उसके जुल्म का बदला नहीं लिया
आदत कुछ ऐसी वुरसे में पायी हुसैन ने।
मकसूद अली कादरी ने शेर पढ़ा -
खुद जान दे दी कुनबा भी कुरबान कर दिया
यूं हमको हक शनासी कराई हुसैन ने।
नवाबउद्दीन शैदा ने कहा -
अफलाक से जमीं का तआर्रूफ करा दिया
पहचान करबला की कराई हुसैन ने।
शाद पीलीभीत ने शेर पेश किया -
सर दे दिया यजीद को बैअत के नाम पर
उंगली भी हाथ की ना थमाई हुसैन ने।
उस्मान खां रजी ने कहा -
अब तक जो उम्र तुमने गुजारी है ऐ रजी
उस राह पर चले जो बताई हुसैन ने।
बहार पीलीभीत ने हुसैन की शान में ये शेर पेश किया -
थी करबला पे तपती हुई रेत हर तरफ
फिर भी न देखी आबला पाई हुसैन ने।
तौसीफ कदीरी ने कहा -
वह करबला में शान दिखाई हुसैन ने
नेजे पे भी किताब सुनाई हुसैन ने।
हाशिम खां ने शेर पढ़ा -
कासिम कहीं तो अकबर ओ अब्बास है कहीं
बस्ती थे करबला में बसाई हुसैन ने।
अशरफ जमा काबिश ने कहा -
फैलाई थी यजीद ने जो मौत की बिसात
पल में समेत दी वह चटाई हुसैन ने।
मुशायरे में हसन मीर सेथली, शाद पीलीभीती, शकील अंजुम, शकील सेथली, सरकारी निमाजी, असलम वारसी, बुंदन खां नूर ने भी अपने शेर पढ़े। इस मौके पर जियाउद्दीन जिया, अब्दुल कादिर, नसीम खां, रियासत हुसैन, जफर राही, इरशाद, अतहर नूरी, अब्दुल हबीब अशरफी, सईद खां, मौलाना अतहर, इरशाद, मतीन खां सहित कई लोग मौजूद रहे।