बंगाली बाहुल्य इलाकों में मतदाता सूचियों में अपंजीकृत बंगाली मतदाताओं के वोट बनने से कहीं खुशी है तो कहीं न बनाए जाने से उनमें मायूसी। इस तरह की अपनाई गई दोहरी नीति से इस बार भी तमाम बंगाली समुदाय के लोग मतदान करने से वंचित रह जाएंगे।
वर्ष 1962 से वर्ष 1971 तक जनपद के बीहड़ इलाकों में बंगाली समाज के आए तमाम शरणार्थियों को कॉलोनियां बनाकर बसाया गया था। बराही क्षेत्र में मात्र एक गभिया सहराई ग्राम पंचायत थी। बाद में वोटों की राजनीति के चलते व विकास की गति बढ़ाने को तत्कालीन मुख्यमंत्री नरायन दत्त तिवारी ने 17 गांवों की मात्र एक ग्राम पंचायत का विभाजन कर 1989 में सात ग्राम पंचायतें बना दी थीं। हाल ही में तीन ग्राम पंचायतें और बढ़ाकर दस कर दी गई। इन ग्राम पंचायतों में धीरे-धीरे बंगाली परिवार बढ़ते गए। तमाम परिवार ऐसे भी थे, जिनके पास न तो शरण लेने का प्रमाण था और न ही नागरिकता संबंधी कोई प्रमाण। नतीजन उन्हें कुछ हासिल नहीं हुआ। यहां जन्मीं उनकी संतानों ने हिंदुस्तानी आवोहवा में सांस ली, लेकिन इन्हें भी पहचान नहीं मिल सकी। सरकारी स्तर पर जब मतदान का प्रतिशत बढ़ाने व वोटर कार्ड देने का अभियान चला तो इन लोगों ने भी आवेदन किए। बीएलओ से सांठगांठ वाले तो वोट बनवा गए, लेकिन शेष बंगाली लोगों का दर्द इस चुनाव में भी सामने आया।
नौजल्हा के 21 वर्षीय संजय ढाली ने वर्ष 2014 में गभिया सहराई इंटर कॉलेज से 12वीं पास की। पिता असीम ढाली एवं मां लक्ष्मी ढाली सहित किसी को मतदाता नहीं बनाया गया। संजय का कहना है कि शरणार्थी कैंप या अन्य अभिलेखों की बात तो जो लोग जागरूक थे उनके पास थे। गरीब मजदूरी करने वालों के पास कुछ नहीं था।
महाराजपुर के सुशांत विश्वास ने भी परिवार वालों के वोट बनवाने को कई बार आवेदन किया। सुंशात भी दूसरों की तरह यह पले बढ़े और पढ़ाई की, लेकिन पूरा परिवार मतदाता बनने से वंचित है। जबकि बीएलओ द्वारा उन्हीं के गांव के तमाम परिवारों के वोट बना दिए।
नौजल्हा के पलाश मंडल ने गांव में ही जन्मे। वर्ष 2012 में गभिया स्थित कॉलेज से इंटर की परीक्षा पास की। पलाश ने वोट बनवाने की कोशिश की लेकिन न तो उनके पिता विश्वजीत मंडल और न ही मां लीला मंडल का वोट बनाया गया। थक हार पलाश अब किस्मत को दोषी मान चुप बैठ चुके हैं।
बंगलाभाषी के साथ सौतेला व्यवहार
बंगाली समाज के साथ सौतेला व्यवहार किया। जिनके पास कोई अभिलेख नहीं थे, उनके वोट बना दिए और जो यहीं जन्मे और पले बढ़े उन्हें मतदाता बनने से वंचित कर दिया गया।
अजीत मंडल, ग्राम प्रधान, महाराजपुर