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सस्टिम बेहाल : जानलेवा बीमारियों के इलाज के लिए न संसाधन, न डाक्टर

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पीलीभीत। सीएम योगी आदित्यनाथ ने सरकारी अस्पतालों में चिकित्सा सुविधा बेहतर करने के लिए तमाम कदम उठाए, लेकिन स्थानीय जिला अस्पताल में जानलेवा बीमारियों के इलाज के लिए न तो पर्याप्त डॉक्टर हैं, न ही एमआरआई जैसे उपकरण। अगर किसी को एमआरआई कराना हो तो उसके लिए मरीज को महंगे डायग्नोस्टिक सेंटर खोजने पड़ते हैं या फिर बरेली की ओर रुख करना पड़ता है।
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जिला अस्पताल डाक्टरों की कमी का दंश लंबे समय से झेल रहा है। डॉक्टरों के दस पद लंबे समय से रिक्त चल रहे हैं, 17 ही डॉक्टर इस समय हैं। जो डॉक्टर हैं भी, वे अक्सर अपनी ड्यूटी से नदारद रहते हैं। मरीज और तीमारदार परचा बनवाने के बाद घंटों डॉक्टर तलाशते रहते हैं। न मिलने पर कभी-कभी मायूस होकर भी लौटना पड़ता है। जिला अस्पताल आने वाले मरीजों की रोजाना की ओपीडी 1000 से ऊपर रहती है। इमरजेंसी वार्ड में नियमानुसार चार डाक्टरों की निुयक्ति होनी चाहिए, लेकिन तैनाती एक की भी नहीं है। ओपीडी के डाक्टरों की ही इमरजेंसी वार्ड में ड्यूटी लगाई जाती है। जब तक ये डॉक्टर ओपीडी में रहते हैं, तब तक यहां दवा लेने आने वाले मरीजों को डॉक्टर का इंतजार करना पड़ता है। कभी-कभी मरीज बिना इलाज कराए ही लौट जाते हैं। ब्रेन हैमरेज और कैंसर के मरीजों को तो दूर से देखते ही बरेली या लखनऊ रेफर कर दिया जाता है। अस्पताल में एमआरआई की भी सुविधा नही है। डॉक्टर अक्सर मरीजों को एमआरआई कराने को लिख देते हैं। मरीज प्राइवेट नर्सिंग होम या डायग्नोस्टिक सेंटर तक भटकता रहता है। फिर उसे महंगी एमआरआई कराना पड़ती है।
अस्पताल में चेस्ट स्पेशलिस्ट डॉक्टर नहीं है। कॉर्डियोलॉजिस्ट की भी कमी है। फिजिशियन एक ही है, जबकि पद दो स्वीकृत हैं। नेत्र चिकित्सक दो हैं। दांत रोग विशेषज्ञ डॉक्टर भी नहीं हैं। न्यूरो सर्जन भी नहीं हैं। इसके लिए मरीजों को बरेली जाना पड़ता है। बर्न यूनिट की बिल्डिंग बनी खड़ी है, लेकिन यहां मरीज इसलिए भर्ती नहीं किए जाते क्योंकि न स्टाफ है, न ही डॉक्टर।
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