सामाजिक वानिकी के डीएफओ आदर्श कुमार के प्रयास यदि रंग लाए तो जिले की पहचान बाघ, बांसुरी के साथ-साथ बांस के रूप में की जाएगी। इसके लिए जिले में बांस की खेती को बढ़ावा देने की योजना तैयार की जा रही है। इसके लिए डीएफओ ने सीडीओ से मंत्रणा की है।
तराई के कृषि प्रधान जनपद में यूं तो गेहूं, धान गन्ना प्रमुख फसलें हैं वहीं बड़े भूभाग पर जंगल हैं। जिसे टाइगर रिजर्व का दर्जा मिला हुआ है। ऐसे में यहां की जलवायु को देखते हुए बांस की खेती की भी संभावनाएं हैं। पीलीभीत बांसुरी उद्योग के लिए भी दुनिया भर में विख्यात है लेकिन यहां बांस की पैदावार न के बराबर होने के कारण यहां बांसुरी बनाने वाले कारीगर असम से बांस लाते हैं। हालांकि कुछ किसान गांव में खेतों की मेड़ अथवा कोने पर बांस लगाते हैं, लेकिन इसकी व्यवसायिक खेती नहीं होती। अब सामाजिक वानिकी ने जिले में बांस की खेती को प्रोत्साहित करने की योजना बनाई है। इसके लिए शुक्रवार को सामाजिक वानिकी डीएफओ आदर्श कुमार ने विकास भवन पहुंचकर सीडीओ डॉ. दिनेश कुमार सिंह से मुलाकात की। दोनों अधिकारियों ने जिले में बांस की खेती की संभावनाओं पर चर्चा की। तय किया गया कि ग्राम पंचायत सचिवों के माध्यम से गांव में इच्छुक लोगों की तलाश की जाए। इच्छुक किसानों को बैठक एवं प्रशिक्षण के माध्यम से इसकी विस्तृत जानकारी देकर इसके लाभ से अवगत कराया जाएगा। ऐसे किसानों को वन विभाग की ओर से पौध भी उपलब्ध कराई जाएगी।
बरेली में आसानी से हो सकेगी बिक्री
बांस एवं इससे बनी चीजों के लिए पड़ोसी जनपद बरेली प्रदेश में प्रसिद्ध हैं। ऐसे में जिले में बांस उत्पादन करने वाले किसानों को तैयार बांस बेचने में भी ज्यादा दिक्कत का सामना नहीं करना पड़ेगा।
तीन में साल में हो जाता है तैयार
नर्सरी में तैयार पौध को खेतों में लगाने के बाद तीन साल में बांस बिक्री के लिए तैयार हो जाता है। तैयार बांस को काटकर बेचा जाता है इस दौरान नए कल्ले भी निकलते रहते हैं। इस तरह एक बार बांस लगाने पर 40-50 साल तक खेती चलती रहती हैं।
बांसुरी का बांस उगाने की कवायद
सामाजिक वानिकी की नर्सरी में फिलहाल सामान्य बांस के उत्पादन के लिए नर्सरी तैयार की जा रही है। जिले में बांसुरी बनाने का काम बड़े पैमाने पर होता है, जिसके लिए असम से बांस मंगाना पड़ता है। वन विभाग अब असम से बांसुरी में प्रयोग होने वाले बांस के बीज मंगवाकर इसकी पौध भी तैयार कराएगा। यदि यह प्रयोग सफल रहा तो बांसुरी बनाने वालों को भी जिले से ही सस्ते दाम पर बांस मिल सकेगा।
जिले में बांस की खेती की अपार संभावनाएं हैं। इसके लिए किसानों को प्रेरित किया जाएगा। नर्सरी में पौध तैयार कराई जा रही है। इच्छुक किसान विभाग से पौध प्राप्त कर सकते हैं। - आदर्श कुमार, डीएफओ सामाजिक वानिकी