घोड़ों में ग्लैंडर्स की बीमारी जानलेवा होती है। इसका कोई इलाज भी नहीं है। पहचान होने पर घोड़े को मारना पड़ता है ताकि अन्य पशुओं अथवा मनुष्यों में इसका प्रकोप न बढ़ सके। यह जानकारी पशुपालन विभाग की ओर से आयोजित कार्यशाला में दी गई। पशुपालन विभाग की ओर से विकास भवन सभागार में शनिवार को कार्यशाला का आयोजन किय गया। इसका शुभारंभ सीडीओ इंद्रदेव द्विवेदी ने किया। लखनऊ से आए अपर निदेशक डॉ. जेएन सिंह ने बताया कि घोड़ों में ग्लैंडर्स की बीमारी पिछले कुछ समय से देखी जा रही है जो घोड़ों के साथ मनुष्य के लिए भी खतरनाक है। इसके लिए हम सभी को इससे सचेत रहने के साथ पशुपालकों को भी इसके प्रति जागरूक करने की जरूरत है। उन्होंने बताया कि घोड़ों के शरीर में जगह जगह गांठ होने के साथ साथ मुंह और नाक से रिसाव होता है। ग्लैंडर्स की शक होने पर खून का नमूना लेकर जांच को लैव पर भेजा जाता है और रोग की पुष्टि होने पर यूथनाइज कर घोड़े को मारना पड़ता है। मृत घोड़े को आठ फिट गहरे गड्ढे में दबाना चाहिए ताकि इसके विषाणु न फैल सकें। मुख्य पशु चिकित्साधकारी डॉ. ज्ञान प्रकाश सिंह ने जिले में अभी तक ऐसा कोई केस नहीं मिला है। घोड़ों के साथ गधों एवं खच्चरों में भी इसके फैलने की संभावना रहती है। कार्यशाला में सभी पशुचिकित्साधिकारी मौजूद रहे।
पशुपालक को मिलता है मुआवजा
सावीओ डॉ. ज्ञान प्रकाश सिंह ने बताया कि ग्लैंडर्स होने पर संबंधित घोड़ा, गधा अथवा खच्चर को मारना पड़ता है। इसके बदले सरकार की ओर से मुआवजे के रूप में घोड़े के लिए 25 हजार जबकि गधा या खच्चर के लिए 16 हजार रुपये मुआवजा दिया जाता है।