देश की आजादी में हिस्सा लेने वाले स्वतंत्रता सेनानी मेजर गुरुदित्त सिंह नहीं रहे। वह 99 साल के थे। पुलिस ने स्वतंत्रता सेनानी को अंतिम सलामी दी। वहीं अधिकारियों ने पुष्पचक्र चढ़ाकर श्रद्धांजलि दी। सैकड़ों लोगों की मौजूदगी में उनके बड़े बेटे देवेंद्र सिंह ने मुखाग्नि दी।
मूलरूप से पंजाब के वल्लड़वाल गुरुदासपुर निवासी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मेजर गुरुदित्त सिंह वर्ष 1956 में पंजाब से क्षेत्र के गांव पिपरिया करम में आकर परिवार सहित बस गए थे। उनके पुत्र देवेंद्र सिंह ने बताया आजादी की लड़ाई में भाग लेने के बाद भी उनके पिता को कई साल तक स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को मिलने वाली पेंशन नहीं मिली। इस पर वर्ष वर्ष 2006 में हाईकोर्ट की शरण ली। तब उनको 2006 में पेंशन मिलना शुरू हुई। हालांकि पिछले वर्षों 1991 से बकाया पेंशन का सरकार ने भुगतान किया। देवेंद्र ने बताया कि उनके पिता सात भाई थे, जिनमें पांच सेना में रहे। सोमवार को 99 साल की उम्र में उनके पिता का निधन हो गया। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के निधन की सूचना पर एसडीएम ज्ञानेंद्र सिंह, सीओ सिटी यशवीर सिंह, तहसीलदार दिग्विजय सिंह उनके गांव पहुंचे। तीनों अधिकारियों ने उनके पार्थिव शरीर पर पुष्पचक्र चढ़ाकर श्रद्धांजलि दी वहीं पुलिस टीम ने सलामी दी। इस दौरान एसडीएम ने शासन की ओर से अंतिम संस्कार के लिए पांच हजार रुपये की धनराशि भी प्रदान की। मेजर गुरुदित्त अपने पीछे तीन पुत्र देवेंद्र, राजेंद्र, और अरविंदर व तीन विवाहित पुत्रियों सर्वजीत कौर, मंजीत कौर, सुखजीत कौर सहित भरापूरा परिवार बिलखता छोड़ गए। दोपहर को उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया। उनकी अंतिम यात्रा में क्षेत्र के तमाम लोग मौजूद रहे।
अंग्रेजी सेना होने के बावजूद निकाला था जुलूस
जराकोठी। मेजर गुरदित्त सिंह वर्ष 1934 से 1946 तक अंग्रेजी सेना में तैनात रहे। इस दौरान देश की आजादी के लिए उन्होंने अंग्रेजी सेना के वाहन पर सुभाष चंद्र बोस की फोटो लगाकर जुलूस निकाला। इसकी जानकारी होने पर अंग्रेजों ने उनको नौकरी से निकाल दिया और सात माह के लिए जेल में डाल दिया। उनके बड़े पुत्र देवेंद्र सिंह ने बताया कि इस दौरान अंग्रेजों ने उन्हें माफी मांगने पर दुबारा सेना में रखने का आश्वासन भी दिया, लेकिन वह अंग्रेजों के आगे झुके नहीं।