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तार फेंसिंग के नाम पर करोड़ों खपाए, फिर भी बाघ बाहर जाने से नहीं रोक पाए

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अमरिया। टाइगर रिजर्व प्रशासन ने तार फेंसिंग के नाम पर करोड़ों का बजट खपाया। मगर, ठीक ढंग से तार फेंसिंग नहीं हो पाई। इसका परिणाम यह है कि बाघ जंगल से बाहर आबादी क्षेत्र में पहुंच रहे हैं। इन दिनों गन्ने का सर्वे चल रहा है। किसान गन्ने की सिंचाई, गुड़ाई करने जाते हैं तो वहां बाघ कुनबे सहित बैठे मिलते हैं। बाघ के खौफ के चलते किसान और मजदूरों में खौफ है। ग्रामीणों को आशंकित रहते हैं कि बाघ कब हमला कर दे।
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टाइगर रिजर्व बनने के बाद अफसरों ने करोड़ों की लागत से तार फेंसिंग कराने के दावे किए थे। इसमें बजट तो पूरा ठिकाने लग गया, मगर तार फेंसिंग नहीं हो पाई। कुछ एक जगह तार लगे भी तो वह जर्जर होकर खत्म हो गए। जंगल खुला होने से आबादी इलाके में पिछले आठ सालों से बाघों का कुनबा घूमता रहता है। टाइगर रिजर्व में बाघों की संख्या भी बढ़ी है। पहले बाघ कम थे तो नदी नालों के किनारे नरकुल में छिपकर बैठ जाते थे। मगर, अब इनकी संख्या बढ़ने से बाघ छिपने के लिए गन्ने के खेतों का सहारा ले रहे हैं। इस समय एक तो गन्ने का सर्वे भी चल रहा है।
वहीं दूसरी ओर किसान अपने खेतों में जाकर गन्ने की सिंचाई, गुड़ाई भी करते हैं। न तो वन विभाग बाघों को जंगल में भिजवाने का इंतजाम कर रहा है, न ही गन्ना विभाग ने इस दिशा में किसानों की सुरक्षा के लिए कोई कदम उठाए हैं। हाल ही में गजरौला और जराकोठी में राहगीर बाघ के हमले में घायल हो चुके हैं। कई लोगों की जान भी जा चुकी है। अमरिया तहसील क्षेत्र में कहीं भी जंगल नहीं है। मगर, कस्बे की एक सीमा उत्तराखंड के जंगल से लगी है। इसके बावजूद इस क्षेत्र में बड़ी संख्या में बाघ और अन्य हिंसक वन्यजीव विचरण करते रहते हैं। वर्ष 2012 में एक बाघिन को अपने दो शावकों के साथ इस इलाके में पहली बार देखा गया था। बाघिन अपने शावकों के साथ देवहा नदी की तलहटी और झाड़ियों के पास रहती थी। इसका परिवार बढ़ा तो बाघों की संख्या एक दर्जन से अधिक पहुंच गई।
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बाघों की चहलकदमी से ठीक से खेती नहीं हो पा रही है। डर की वजह से मजदूर काम करने को तैयार नहीं होते। हर समय जान का खतरा बना रहता है। वन विभाग को इनकी रोकथाम के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए। - सतनाम सिंह, किसान
गन्ने के खेतों में बाघ अक्सर मजदूरों के सामने आ जाते हैं। इससे मजदूर गन्ने की गुड़ाई और सिंचाई के लिए तैयार नहीं होते। बाघों की दहशत इतनी है कि एक मजदूर की जगह चार लगाने पड़ते हैं। - प्रशांत शुक्ला, किसान
खेतों में विचरण करने वाले बाघों का स्वभाव जंगल के बाघों से अलग है। यह बाघ इंसानों के बीच पलकर बड़े हुए हैं। इसलिए ये इंसान को देखते ही खुद रास्ते से हट जाते हैं। वन विभाग की ओर से निगरानी के लिए टीमें लगाई गई हैं। ये टीमें बाघों की 24 घंटे निगरानी करती है। - सतेंद्र कुमार चौधरी, रेंजर, वन्यजीव प्रभाग
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