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सकुशल घर पहुंचने की करते थे दुआ

Fri, 01 May 2015 12:02 AM IST
ब्यूरो, अमर उजाला पीलीभीत
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नेपाल से लौटे मोहल्ला साहूकारा (कुरैशियान) के मोहम्मद रऊफ खान और जुवैद खान ने यहां जो आपबीती सुनाई उससे कइयों के रोंगटे खड़े हो गए। मोहम्मद रऊफ और जुनैद ने बताया कि करीब छह साल से नेपाल के जिला ललितपुर के लगनरेक में रहकर राजेंद्र न्योपानी के फर्नीचर के कारखाना में कारीगरी का काम करते थे। उनके साथ उनका भतीजा रकीव खान भी नेपाल में रहता था। घटना के दिन दोनों भाई कारखाना में काम कर रहे थे। जबकि भतीजा लंच का समय होने पर घूमने निकल गया था। अचानक लगा कि जमीन उल्टी हो गई हो। आंखों के आगे अंधेरा छा गया था। करीब चार मिनट तक कुछ होश ही नहीं रहा कि कहा है। इसके बाद तबाही को देखरकर सोच लिया था कि अब तो जिंदा ही नहीं बचना है। कारखाने की चारों ओर की बाउंड्री गिर गई थी। पूरी तरह से होश में आने पर भाग कर समीप स्थित खेल के मैदान बुद्ध विकास में शरण ली। चारों ओर कोहराम मचा हुआ था। घर लौटने को दो दिन के चलने के बाद हवाई अड्डे पहुंचे। हवाई अड्डे पर प्लेन तो पहुंच रहे थे, लेकिन घायल, वृद्ध और बच्चोें को लेकर भारत लौट रहे थे। उन लोगों को बसें आने की जानकारी दी गईं। चार रात तक खुले आसमान के नीचे जाग कर काटने के बाद बस मिली। बस ने उनको गोरखपुर छोड़ा।
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जीरो बैलेंस के रेलवे टिकट से पहुंचे गोंडा
मोहम्मद रऊफ ने बताया कि गोरखपुर से उन लोगों को रेलवे का जीरों बैलेंस का बरेली जंक्शन का टिकट दिया गया, लेकिन वे लोग गोंडा मेें ही उतर गए और उसी टिकट से दूसरी ट्रेन से रात पूरनपुर पहुंचे।

नेपाल की ओर से नहीं मिली कोई सहायता
मोहम्मद रऊफ ने बताया कि उन लोगों को नेपाल की ओर से कोई भी सहायता नहीं मिली। नेपाल में तो चार दिनों तक भूखा ही रहना पड़ा।

चार दिन बाद हुआ परिवार वालों से संपर्क
मोहम्मद रऊफ और जुवैद ने बताया कि घटना के बाद नेपाल में मोबाइल नेटवर्क, बिजली सब कुछ गुल हो गई थी। अंधेरे के चलते तो रातें काटनी मुश्किल हो जातीं थी। चार दिन तक परिवार के लोगों से भी संपर्क नहीं हो सका। जब बस पर सवार हो रहे थे, तब नेटवर्क आने पर परिवार वालों को सलामती की जानकारी मोबाइल पर दी।
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चारों ओर मलबे से दबे पड़े थे लोग
रऊफ, जुवैद ने बताया कि भूूकंप के बाद जिधर भी नजर जाती थी, उधर लाशें और लोग मलबे से दबे दिखाई देते थे। तमाम लोग तो हाथ, पैर आदि दबा होने पर निकालने को गिड़गिड़ा रहे थे, लेकिन चाह कर भी उनकी मदद नहीं कर पा रहे थे। वजह जिस मलबा के नीचे वे लोग दबे थे। उसे हटाना मुश्किल था। 
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