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बाघों और इंसानों की मित्रता में कहीं खलनायक न बन जाएं शिकारी

सार

जंगल से कई किमी दूर अमरिया में आठ सालों से रह रहा है 10 से अधिक बाघों का कुनबा
 
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पीलीभीत के अमरिया क्षेत्र में घूमते बाघ। - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, बरेली
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विस्तार
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यह कुनबा इन सालों में कभी भी इंसानों पर नहीं हुआ हमलावर, किसानों को भी नहीं कोई एतराज
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विशेषज्ञ बोले- अमरिया के बाघों का बदल रहा स्वभाव, इसलिए नहीं हो रहा मानव-वन्यजीव संघर्ष

पीलीभीत। बाघों के लिए देश समेत विदेशों में मशहूर पीलीभीत अब बाघ और इंसानों की मित्रता की मिसाल बनता जा रहा है। खास बात यह है कि जंगल छोड़ दस से अधिक बाघ अमरिया क्षेत्र में पिछले आठ साल से आबादी क्षेत्र में अपना अशियाना बनाए हुए हैं, मगर आज तक बाघ इंसानों पर कभी हमलावर नहीं हुए। विशेषज्ञों के मुताबिक, बाघों का व्यवहार यहां मित्रवत हो चुका है। ऐसे में अब इंसानों ने तो समझौता कर लिया है, मगर आबादी क्षेत्र में घूम रहे इन बाघों के कुनबे की शिकारियों से सुरक्षा के कोई पुख्ता इंतजाम नहीं हैं या यूं कहें कि यहां के किसान ही बाघों के रक्षक बने हुए हैं।
करीब 73 हजार हेक्टेयर में फैले पीलीभीत टाइगर रिजर्व में 65 बाघ प्रवास कर रहे हैं। बाघों की बढ़ती संख्या के कारण ही पीटीआर ग्लोबल अवार्ड जीतकर देश ही नहीं, बल्कि 13 देशों की टाइगर सेंचुरी में पहले स्थान पर आ खड़ा हुआ है। इन सबके बीच बाघों के मामले में पीलीभीत एक और मिसाल कायम करने के करीब पहुंच रहा है। वह है बाघों और इंसानों के बीच मित्रता। सुनने में यह जरूर अटपटा सा है, मगर हकीकत है।
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जनपद के अमरिया क्षेत्र में पिछले आठ साल से दस से अधिक बाघों का कुनबा आबादी क्षेत्र में रह रहा है। सबसे अहम बात यह है कि बाघों का यह कुनबा नदी के किनारे, मार्गों पर खेतों में लगातार चहलकदमी कर रहा है, मगर इक्का दुक्का मामलों को छोड़कर बात करें तो बाघों का यह कुनबा इन सालों में कभी भी इंसानों पर हमलावर नहीं हुआ। इन्हीं सबके चलते यहां के किसानों को भी अब बाघों के आबादी क्षेत्र में घूमने पर भी कोई एतराज नहीं है।
विशेषज्ञों के मुताबिक इन बाघों के स्वभाव में परिवर्तन देखा जा रहा है, मगर बाघों के इस कुनबे पर किसी गैंग या शिकारी की कुदृष्टि पड़ती है तो मौजूदा इंतजामों को देखते हुए वह अपने काम को अंजाम देकर आसानी से भाग सकते हैं। कुछ माह पूर्व यहां शिकारी द्वारा लगाए गए एक फंदे में बाघ फंस भी चुका है, गनीमत यह रही कि बाघ खुद ही फंदे से निकल भाग गया। हालांकि यहां वन एवं वन्यजीव प्रभाग, विश्व प्रकृति निधि और डब्ल्यूटीआई बाघों के कुनबे की निगेहबानी में लगे हैं, मगर स्थितियों को देखते हुए इंतजाम नाकाफी है।

2012 में शावकों की सलामती को अमरिया पहुंची थी बाघिन

वर्ष 2012 में जंगल से निकलकर एक बाघिन और दो शावक अमरिया क्षेत्र के शुक्ला फार्म पहुंचे थे। बताते हैं कि बाघिन अपने शावकों की सुरक्षा के चलते यहां आई थी। इसके बाद बाघिन और उसके शावकों ने अमरिया क्षेत्र के गन्ने के खेतों को कॉरीडोर के रूप में इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे इसी कॉरीडोर के माध्यम से यहां बाघों की संख्या बढ़ती गई और आज यहां 10 से अधिक बाघों का कुनबा प्रवास कर रहा है। शुरूआत में यहां के लोगों में दहशत फैल गई थी, मगर बाघों के मित्रवत व्यवहार को देख इंसानों ने भी उनसे समझौता कर लिया। अब किसानों और बाघों ने एक दूसरे की दिनचर्या को भांपकर अपने-अपने समय के मुताबिक ही बाहर निकल रहे हैं।

शिफ्टिंग की चल रही कवायद, मगर आसान नहीं

प्रदेश के प्रधान मुख्य वन संरक्षक वन्यजीव सुनील कुमार पांडे ने गत वर्ष बाघों को दूसरे जंगलों में शिफ्ट करने के लिए वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया से अनुमति और मदद के लिए पत्र भेजा था। मगर वन विशेषज्ञों के मुताबिक अमरिया के बाघों की अधिकता के चलते उन्हें शिफ्ट करना आसान नहीं होगा।

अब फसलों की रखवाली की जरूरत नहीं होती

अन्य टाइगरों की तुलना में अमरिया में घूम रहे बाघों के स्वभाव में अंतर है। मेेरा 25 से अधिक बार टाइगर से सामना हो चुका है, मगर उसने कभी भी अटैक नहीं किया। कई बार तो ऐसा हुआ कि मैंने टाइगर को नहीं देखा, मगर टाइगर खुद ही अपना रास्ता बदल गया। सबसे खास बात यह है कि अब फसलों की रखवाली की जरूरत नहीं होती है। - परमवीर सिंह पैरी, सूरजपुर

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पिछले आठ सालों से बाघ फॉर्म हाउस के आसपास ही खेतों में घूमते रहते हैं। खेतों में काम करते समय कई बार बाघों से आमना सामना हो चुका है, मगर उन्होंने कभी कोई नुकसान नहीं पहुंचाया। किसानों को चाहिए कि वह बाघों के रास्ते में न आएं और यही क्षेत्रवासी कर भी रहे हैं। - गोल्डी सिंह, मझारा

बाघ की प्रवृत्ति होती है कि वह इंसानों से दूरी बनाकर रखता है, मगर अमरिया में घरों के दूर-दूर होने और अनुकूल वातावरण मिलने से बाघ अमरिया में प्रवास कर रहे हैं। जहां तक बाघों की शिफ्टिंग की बात है तो बाघों को शिफ्ट करने का काम आसान नहीं है। - पीसी पांडेय, प्रोजेक्ट हेड, वाइल्ड लाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया

अमरिया में रह रहे बाघों की सुरक्षा को लेकर टीमें बनाई गई हैं, जो रोस्टरवाइज अपनी ड्यूटी को अंजाम देती हैं। टाइगर ट्रेकर भी लगे हैं। स्थानीय लोगों को भी जागरूक किया गया है। इनके शिफ्टिंग को लेकर भी शासन स्तर पर मंथन पर चल रहा है। - संजीव कुमार, डीएफओ, वन एवं वन्यजीव प्रभाग

बाघ शांतिप्रिय पशु है। यह पर्यावरण की खूबसूरती को बनाकर रखते हैं। बाघों के घूमने के समय इंसानों को खेत या जंगल में नहीं जाना चाहिए, जिससे कि दोनों में टकराव की स्थिति उत्पन्न न हो। शाम छह बजे से सुबह 6 बजे तक का समय बाघों का है। उतना समय बाघों के लिए रहने दें, बाकी पूरा दिन अपनी खेती बाड़ी का काम करें। - चारू दत्त सिंह, प्रधान मुख्य वन संरक्षक, चंडीगढ़

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