जीवनदाई देवहा की मुक्ति के लिए प्रशासन ने कुछ नहीं किया
नदियों को प्रदूषण मुक्त करने को एनजीटी के आदेश जिला प्रशासन के आगे शायद कोई मायने नहीं रखते। अब शहर की लाइफ लाइन कही जाने वाली देवहा नदी को ही लें तो नदी प्रदूषित न हो, इसको लेकर नदी में प्रतिमा विसर्जन पर तो रोक लगा दी गई, लेकिन कूड़ा करकट व गंदे पानी को नाले में बहाने वालों पर कोई अंकुश नहीं लगा। पालिका प्रशासन द्वारा कूड़ा करकट से निजात दिलाने के लिए कूड़ा निस्तारण योजना भी बनाई। इसके तहत गत वर्ष भूमि की खरीदारी के प्रयास हुए, लेकिन सबकुछ फाइलों में ही दबकर रह गया।
नदी में रोजाना डाला जाता है आठ मीट्रिकटन कूड़ा
करीब ढाई लाख आबादी वाले इस शहर में कूड़ा निस्तारण के लिए करीब 34 अस्थाई डलावघर बने हैं। पालिका के सफाई कर्मचारी 27 वार्डों से कूड़ा उठाकर इन्हीं अस्थाई डलावघरों में डालते हैं। हर रोज इन अस्थाई डलावघरों से करीब आठ मीट्रिक टन कूड़ा उठाकर देवहा नदी में डाला जा रहा है। नदी की तलहटी के एक बड़े हिस्से कूड़े के बड़े-बड़े ढेर नदी की आस्था के साथ खिलवाड़ करते नजर आ रहे हैं। वहीं तीन बड़े नालों के जरिए शहर भर का गंदा पानी बरसों से नदी में बहाया जा रहा है। आलम यह है कि अब नदी के पानी का रंग भी काला होता जा रहा है। ऐसे में आस्था से जुड़े लोग भी अब इस नदी को प्रदूषित मानकर स्नान आदि करने से कतराने लगे हैं।