पानी के लगातार दोहन पर अंकुश लगाने को जहां एक ओर सरकार क्राप डायवर्सीफिकेशन योजना के तहत धान की मुख्य फसल का क्षेत्रफल कम करने पर करोड़ों रुपये खर्च कर रही है, वहीं किसान चैनी धान उगाकर सरकार की योजनाओं को धूमिल करने के साथ भूमि और पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रहे हैं।
गेहूं की कटाई के बाद दो माह के खाली सीजन में तराई क्षेत्र के किसानों में चैनी (चाइनीज) धान उगाने का चलन बढ़ रहा है। इसके लिए क्षेत्र में अभी से बड़े पैमाने पर इसकी पौध (बेड) तैयार होने लगी हैं। 60 दिन में होने वाली इस फसल को साठा धान भी कहा जाता है, लेकिन इन दो माह में बारिश न होने के कारण किसानों को टयूबवैल अथवा नहरों से सिंचाई करनी पड़ती है। पौध की रोपाई से कटाई के आठ दिन पूर्व तक खेत में पानी भरा रखना पड़ता है, जिससे पानी की खपत काफी बढ़ जाती है।
खेत को नहीं मिलता आराम
गेहूं की कटाई से पूर्व ही किसान चैनी धान की पौध तैयार कर लेते हैं और कटाई के बाद खेत में आग लगाकर नरई नष्ट कर देते हैं। इसके दो तीन दिन बाद ही धान की रोपाई हो जाती है। वहीं चैनी कटने के तुरंत बाद धान की मुख्य फसल की रोपाई होने लगती है। ऐसे में खेत कुछ समय के लिए भी खाली नहीं रह पाता, जिससे उसकी उर्वरा शक्ति प्रभावित होती है।
हर तरह से नुकसानदायक है चैनी धान
कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक डॉ. एसएस ढाका के अनुसार चैनी की खेती किसी भी स्थिति में लाभदायक नहीं है। लगातार पानी के उपयोग से भूगर्भ जलस्तर कम होता है वहीं चैनी के तुरंत बाद धान की मुख्य फसल होने के कारण चैनी की कीट बीमारियां मुख्य फसल पर आ जाती हैं, जिससे नियंत्रित करने के लिए अधिक मात्रा में दवाएं डाली पड़ती हैं। वहीं दोनों फसलों को एक जैसे पोषक तत्वों की कमी होती है जिससे भूमि का पोषण स्तर भी घट जाता है।
नहीं मिलता सही दाम
चैनी धान में लागत के हिसाब से किसानों को सही दाम नहीं मिल पाता। राइस मिलर्स इसे मनमाने दाम पर खरीद कर स्टाक कर लेते हैं और बेमौसम बड़ी मात्रा में सस्ता धान होने के कारण मुख्य फसल के दाम भी पूरे नहीं मिलते।
पंजाब/हरियाणा की तरह प्रतिबंधित कराने की मांग
भूगर्भ जलस्तर घटने के कारण पंजाब और हरियाणा में इसे प्रतिबंधित कर दिया गया है। भाकियू के जिला उपाध्यक्ष मंजीत सिंह ने भी प्रदेश में इसे प्रतिबंधित कराने को गत वर्ष हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी। अब वह पुन: अपील की तैयारी में हैं।