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चूल्हा जलाने की मजबूरी में गवां रहे जान

Fri, 29 Dec 2017 12:00 AM IST
pilibhit
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tiger atteck - फोटो : amar ujala
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जंगल से सटे इलाकों में लकड़ी की टालें न होने से बढ़ीं समस्याएं 
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वन्यजीवों के हमलों में जान भी गवाई, मुआवजा भी नहीं 

पीलीभीत/ माधोटांडा। पीलीभीत के जंगल को टाइगर रिजर्व का दर्जा मिलने के बाद भले अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जनपद को एक अलग पहचान मिली हो, लेकिन सवाल जंगल से सटे इलाकों में गुजर बसर करने वालेे ग्रामीणों की सुविधाओं और सुरक्षा को लेकर आज भी जवाब तलाश रहा है। वन्यजीवों से सुरक्षा के कोई पर्याप्त इंतजाम नहीं किए जा सके हैं। सुविधाओं के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति की जा रही है। 
जंगल में लकड़ी बीनने जाने का मामला सिर्फ व्यापार तक सीमित नहीं है। प्रतिदिन जंगल से लकड़ी लेने के लिए जान जोखिम में डालने वाले कई ऐसे परिवार भी हैं, जिनके पीछे जंगल के भीतर लकड़ी लेने जाना मजबूरी है। टाइगर रिजर्व घोषित करने के दौरान जंगल के सटे इलाके के लोगों को लकड़ी से निर्भरता कम करने के लिए उन्हें गैस के चूल्हे प्राथमिकता के आधार पर उपलब्ध कराने की बात कही गई थी। लेकिन ऐसा नहीं हो सका। अभी भी तमाम परिवारों के पास गैस कनेक्शन नहीं हैं। टाइगर रिजर्व घोषित किए जाने के बाद जंगल के पड़ोस के गांवों में अब टालों की व्यवस्था भी नहीं है। ऐसे में जंगल किनारे के गांवों के तमाम परिवारों को अपने घर का चूल्हा जलाने के लिए जंगल का रुख करना पड़ता है। पीलीभीत टाइगर रिजर्व की बराही व महोफ रेंज की बात करें तो जंगल से सटे गांवों की महिलाएं चौका -चूल्हा जलाने के लिए पूरी तरह से जंगल पर आश्रित हैं। सुबह होते ही एकजुट होकर जंगल के भीतर तो कभी उससे सटे इलाकों में लकड़ी बीन सर पर लादकर घरों की ओर वापसी करते उन्हें देखा जा सकता है। उनको यह नहीं पता कि जंगल में किस ओर बाघ छिपा बैठा हो और कब वह उसका निवाला बन जाएं। वन विभाग और प्रशासन की ओर से इन पर कार्रवाई और जागरूकता के प्रयास किए गए, लेकिन कभी इसका स्थायी समाधान करने पर विचार नहीं हो सका है। दियोरियाकलां कोतवाली के पिपरइया दियोहना गांव में बुजुर्ग महिला कैलाशो देवी की बाघ के हमले में मौत के बाद एक बार फिर यह प्रश्न उठने लगा है। कैलाशो देवी भी घर पर चूल्हा जलाने की मजबूरी में ही जंगल में लकड़ी बीनने के लिए गई थीं, और बाघ के हमले में उसको जान गंवानी पड़ी। 
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अफवाह करार देकर पल्ला झाड़ लेता है वन विभाग 
दियोरिया। पिपरइया दियोहना गांव की कैलाशो देवी का बाघ के हमले में अधखाया शव मिलने के बाद ग्रामीणों में बाघ की दहशत बढ़ गई है। महिला की मौत पर दुख व्यक्त करने के साथ ही ग्रामीणों ने वन विभाग की कार्यशैली पर भी सवालिया निशान लगाया है। ग्रामीणों ने स्पष्ट कहा कि आए दिन बाघ जंगल से निकलकर आबादी में हमले करता है। ग्रामीणों को दिखाई देने पर सूचनाएं विभागीय अधिकारियों, कर्मचारियों को दी जाती हैं। इसके बावजूद कोई गंभीरता नहीं दिखाई जाती। अधिकारी ग्रामीणों की सूचनाओं को अफवाह करार देकर जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेते हैं। 

जगदीशपुर व उगरनपुर में मिले पगचिह्न 
जहानाबाद। क्षेत्र के ग्राम जगदीशपुर और उगनपुर से लगातार आ रही बाघ के दिखाई देने की सूचनाओं को बृहस्पतिवार को बल मिला है। वन विभाग के अमरिया बीट प्रभारी तेजपाल, राजेंद्र कुमार सैनी, अवनेश कुमार की टीम ने काफी देर तक छानबीन की। इसके बाद उगनपुर निवासी धन सिंह और जगदीशपुर के टिंकू सिंह के गेहूं के खेत में पगचिह्न मिलने की पुष्टि की है। इसके बाद से इलाके में बाघ की दहशत है। 

दूध लेने जा रहे युवक पर बाघ ने लगाई छलांग 
गुलाबटांडा। बाइक से दूध लेने जा रहे दूधिया पर बराही जंगल रास्ते पर बृहस्पतिवार सुबह दस बजे बाघ ने छलांग लगा दी, जिसमें बाइक सवार बाल-बाल बच गया। पीछे से आ रहे राहगीरों के शोरशराबा करने पर बाघ जंगल में चला गया। प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि उनको दो बाघ दिखाई दिए थे। घटना के बाद से क्षेत्रवासी खौफजदां हैं। 
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गांव गुलाबटांडा निवासी 20 वर्षीय सलमान फार्म से दूध खरीदकर उसकी बिक्री करता है। बृहस्पतिवार सुबह वह बाइक से बराही जंगल के पार तराई के गांव में दूध लेने जा रहा था। लैहारी पुल के कुछ आगे पहुंचा था कि जंगल की झाड़ियों से निकले बाघ ने उसकी बाइक पर छलांग लगा दी। हालांकि बाइक सवार बाल-बाल बच गया। यह देख पीछे से आए अन्य राहगीरों ने चीख पुकार मचा दी। शोरशराबा होने पर बाघ जंगल में चला गया। इसकी सूचना मिलने पर वन विभाग के कर्मचारी मौके पर पहुंचे और जानकारी जुटाई। इसी रास्ते पर 23 नवंबर को बाघ ने पताबोझी निवासी दो मजदूर भगवानदीन और लालजीत को हमला कर घायल कर दिया था। आए दिन बाघ की चहलकदमी होने पर वन विभाग के अधिकारियों ने बराही जंगल के इस रास्ते पर राहगीरों की सुरक्षा के लिहाज से शाम छह से सुबह छह बजे तक बैरियर लगाकार रास्ता बंद रखा जाता था। इसके बाद पिछले दिनों सुबह 11 बजे से दोपहर दो बजे तक रास्ता बंद करना शुरू किया गया, लेकिन राहगीरों के विरोध प्रदर्शन के बाद इन रास्तों को खोल दिया गया है। 
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