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श्मशान में नहीं थम रही लाशों की कतार, बेदी के बाहर अंतिम संस्कार

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पीलीभीत। मुक्तिधाम में लाशों की कतार प्रतिदिन बढ़ती जा रही हैं। श्मशान पहुंचने वाले परिजनों को उस वक्त गम और बढ़ रहा जब उन्हें यह पता लगा कि लाशों की कतारों के बीच अंतिम संस्कार के लिए इंतजार करना होगा। बेदियां कम पड़ी तो जहां-तहां जगह मिलने पर चिता लगाकर अपनों का अंतिम संस्कार किया। रविवार की बात करें तो दोपहर तक 21 शवों का अंतिम संस्कार हो चुका था। इसी तरह से कब्रिस्तान और अन्य श्मशान स्थलों पर लाशों के पहुंचने का सिलसिला जारी था। जबकि, सामान्य दिनों में रोजाना दो से तीन शवों का अंतिम संस्कार होता है।
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ईदगाह रेलवे क्रॉसिंग के पास स्थित मुक्तिधाम पर अप्रैल की शुरूआत से ही लाशों के पहुंचने की संख्या बढ़ चुकी है। एक अप्रैल से 19 अप्रैल तक 65 लाशें पहुंच चुकी थी। अब 20 से 25 अप्रैल तक महज छह दिनों में 66 से अधिक लाशों का अंतिम संस्कार हो चुका है। रविवार की बात करें तो दोपहर करीब तीन बजे थे। श्मशान घाट के भीतर की दहकती आंच बाहर तक महसूस हो रही थी। श्मशान की सभी बेदियों पर लाशें दहक रही थी, जबकि परिसर में बेदियों से अलग जमीन पर कई चिताएं लगी हुई थी। लाशें पहुंचने का सिलसिला फिर भी जारी था। कुछ परिवार वाले अंतिम संस्कार के लिए जगह खाली होने को इंतजार में थे। दोपहर तक 21 लाशें पहुंच चुकी थीं। यह देख कर्मकांडी भी दंग थे। श्मशान के अंदर भीड़ और बाहर लगातार अंतिम यात्राओं का सिलसिला जारी होने से लोग हैरत में थे और नजारा देख उनके कदम ठिठक रहे थे। शहर के श्मशान घाट का मंजर जो गवाही दे रहा था, उससे कहीं न कहीं महामारी के बीच सरकारी आंकड़े झूठे से प्रतीत हो रहे थे। उधर, कब्रिस्तान में भी इसी तरह से मरने वालों को सुपुर्द ए खाक करने वालों की भीड़ लगी हुई है। मुक्तिधाम के कर्मचारी भगवान दास ने बताया कि 19 अप्रैल के बाद से तो लाशों की संख्या लगातार बढ़ रही है। शनिवार को 11, शुक्रवार को आठ, बृहस्पतिवार को 11 लाशें पहुंची थी। रविवार को पंद्रह 21 लाशें दोपहर तक आ चुकी हैं।
व्यापारी नेता ने गरीब महिला के अंतिम संस्कार में की मदद
पीलीभीत संकट के इस दौरान में कुछ लोग मददगार भी बने हुए हैं। उत्तर प्रदेश उद्योग व्यापार प्रतिनिधि मंडल के जिलाध्यक्ष अनूप अग्रवाल ने कुछ इसी तरह की मिसाल दी। शहर के मोहल्ला नई बस्ती में एक गरीब परिवार की महिला का निधन हो गया था। वह बेटी के साथ रहती थी। परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर थी। अंतिम संस्कार की सामग्री भी जुटा नहीं पा रहे थे। कुछ लोगों से जब इसका पता लगा तो व्यापारी नेता मदद को आगे आए। महिला के अंतिम संस्कार के लिए समस्त सामग्री मुहैया कराई। बेटी ने मोहल्ले के कुछ अन्य लोगों के साथ पहुंचकर शव का अंतिम संस्कार किया।
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