माधोटांडा। तराई क्षेत्र के शारदा सागर डैम में मछलियों की संख्या लगातार घटती जा रही है। इसके चलते डैम में मछलियों की कई प्रजातियां तो लुप्त हो चुकी हैं, वहीं कई प्रजातियां लुप्त होने के कगार पर हैं। इसके पीछे कई कारण सामने आ रहे हैं। वर्जित क्षेत्र वाली डैम के आसपास की जमीन पर लोगों ने आशियाने बनाकर खेती शुरू कर दी है, उसमें इस्तेमाल होने वाले कीटनाशक मछलियों का जीवन खत्म कर रहे हैं।
शारदा डैम में मछली शिकार का ठेका हर साल करोड़ों रुपये का होता है। इससे सिंचाई विभाग को बड़े राजस्व की प्राप्ति होती है। हालांकि पिछले दो साल से मछलियों का ठेका नहीं किया गया है। ठेका देने वाले मत्स्य निगम की शर्तों के मुताबिक नीलामी ठेका लेने वाले को हर साल एक करोड़ मछली के बच्चे डैम में छोड़ने पड़ते हैं। इस हिसाब से तो मछलियों की संख्या में हर साल बढ़ोत्तरी होनी चाहिए। मगर, डैम में लगातार मछलियों की संख्या घटती जा रही है। डैम में नई प्रजातियों की मछली के बच्चे छोड़ने की संख्या में भी गोलमाल की आशंका अधिक है क्योंकि शारदा डैम की मछली की सप्लाई उत्तर प्रदेश के अलावा उत्तराखंड, असम समेत कई अन्य प्रांतों में जाती हैं। सिंचाई विभाग के इंजीनियर डैम में मछलियों की संख्या घटने से चिंतित हैं। वह यह भी जानते और मानते भी हैं कि मछलियों की संख्या कीटनाशक मिला पानी डैम में आने की वजह से घट रही है, लेकिन इन सबके बाद भी मछलियों की सुरक्षा के लिए सिंचाई विभाग की ओर से कोई कदम नहीं उठाए गए हैं।
डैम में मछली की संख्या लगातार घटने की कई वजह
नाम प्रकाशित न करने की गुजारिश पर सिंचाई विभाग के एक इंजीनियर का कहना है कि उत्तराखंड बनने के बाद शारदा डैम दो प्रांतों की सीमा में पड़ता है। इसकी देखरेख और संचालन की जिम्मेदारी उत्तर प्रदेश सरकार के अधीन है। शारदा सागर खंड इसकी जिम्मेदारी संभाले हुए हैं। उत्तराखंड की सीमा में डैम की जमीन के एक बड़े हिस्से में बड़ी आबादी बस चुकी है। इसी इलाके में सैकड़ों एकड़ जमीन पर ये लोग अवैध तरीके से खेती कर रहे हैं। कृषि फसलों में कीटनाशक दवाइयों का प्रयोग किया जाता है। यही कीटनाशक दवा मिला पानी डैम के पानी में मिलता है तो इसका सीधा असर मछली समेत अन्य जलीय जीवों के जीवन पर पड़ता है। इसकी दूसरी वजह मछलियों की ब्रीडिंग न होना है। डैम सिल्ट से पटने के चलते बरसात में जिन क्षेत्रों से पानी का तेज बहाव डैम में जाता है, वहीं से मछली की ब्रीडिंग होती है, लेकिन अब तेज बहाव न होने के चलते पिछले कई वर्षों से मछलियों की ब्रीडिंग नहीं हो पा रही है।
अवैध शिकार की वजह से घटी मछलियों की संख्या
डैम में किस प्रजाति और कितने वजन की मछली का शिकार किया जा सकता है, इस पर अब तक विभाग ने ध्यान नहीं दिया। मत्स्य निगम का मात्र एक कर्मचारी ही डैम पर रहता है। प्रभावशाली लोगों के ठेका लेने के कारण अफसर भी मात्र खानापूरी करने ही आते हैं। पिछले कई वर्षों में प्रदेश सरकार ने ई-टेंडरिंग के चलते कम से कम दो वर्ष तक डैम में मछली शिकार का ठेका ही नहीं किया। इससे बड़े पैमाने पर अवैध रूप से मछली का अवैध शिकार जारी है।
कई प्रजातियां हो चुकी हैं विलुप्त
शारदा डैम के ठेकेदार के प्रतिनिधि गुड्डू के मुताबिक डैम में कुर्सा, शीतल समेत कई प्रजातियां पूरी तरह से विलुप्त हो गई हैं। डैम में पहले ये मछलियां बड़ी संख्या में पाई जाती थीं। रोहू, कतला, नरेन और सुईया मछली की संख्या भी पहले की अपेक्षा काफी घट गई है। यहां मात्र गोल्डन मछली की संख्या ही बढ़ी है।
शारदा डैम की जमीन के भीतरी (वर्जित क्षेत्र) या बाहरी हिस्से में जो अतिक्रमण हुए हैं, उन्हें हटाने के लिए नोटिस जारी किए जा रहे हैं। जल्द ही दोनों प्रांतों का सहयोग लेकर अतिक्रमण हटाया जाएगा। -हरीश चंद यादव, अधिशासी अभियंता, शारदा सागर खंड