पीलीभीत। वन और वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए भले ही अफसर तमाम दावे कर रहे हों, लेकिन धरातल पर हकीकत इससे परे है। यही वजह है लाखों रुपये खर्च कर जंगल सीमा पर लगाई गई तार फेंसिंग लंबा समय बीतने के बाद भी दुरुस्त नहीं हो सकी है। इसके चलते जंगल से बाहर बाघ, तेंदुए समेत वन्यजीवों की दस्तक बढ़ती जा रही है। वहीं जंगल में अवैध घुसपैठ रोकने को बरती जा रही सख्ती भी दावों तक सीमित रह गई है। लगातार सामने आ रही घटनाएं इसका प्रमाण है।
टाइगर रिजर्व बनने से पूर्व भी वन्यजीव जंगल से बाहर निकलकर किसानों की फसलों का नुकसान करते थे। किसानों ने जब जिला प्रशासन से रोकथाम की आवाज उठाई तो मामला शासन तक पहुंचा। जिसके बाद डब्ल्यूडब्ल्यूएफ से जुड़े सदस्यों ने आगे आकर जंगल से सटे इलाकों के किसानों के साथ बैठक ली और तय किया गया था कि वन्यजीवों की दस्तक रोकने के लिए किसान प्रति एकड़ के हिसाब से धन एकत्र करें। जिससे जंगल सीमा पर तार फेंसिंग कराई जा सके। इसके बाद प्रशासन व किसानों के सहयोग से तार फेंसिंग कराई गई थी। इसके बाद काफी हद तक वन्यजीवों की चहलकदमी से निजात भी मिली थी, लेकिन समय बीतने के साथ विभागीय कर्मियों की लापरवाही हावी होने लगी। देखरेख के अभाव से तार फेंसिंग जर्जर होती गई।
दिखावा बने ‘रखवाले’
जंगल से सटे इलाके के किसानों ने जंगली जानवरों के नुकसान से फसलों को बचाने के लिए रखवाले तो रख लिए है, लेकिन वन्यजीवों की रोकथाम के लिए वह भी रात के समय सिर्फ मचान पर बैठकर टॉर्च डालने के साथ शोर-शराबा मचाने तक सीमित हैं, जानवरों पर इसका खासा असर नहीं दिखाई दे रहा है।
वन्य जीवों के वॉस स्थल में मानव का प्रवेश
बरसात के मौसम में जंगल और इससे सटे कोर एरिया में बड़ी-बड़ी घास खड़ी हो जाती है। जिसे सींक घास कहा जाता है जो बाघ का वॉस स्थल भी मानी जाती है। इन दिनों बड़े पैमाने पर लोग सींक निकालने में जुटे है। खास बात यह है कि इसको टाइगर रिजर्व के रास्ते से ही निकाला जा रहा है। यही वजह है कि जंगल के अंदर पहुंचने पर बाघ, तेंदुआ उनपर हमलावर भी हो जाते है।
वन और वन्यजीवों की सुरक्षा को बेहतर बनाने के लिए लगातार प्रयास जारी है। जंगल सीमा पर कराई गई तार फेंसिंग के सुधार का कार्य भी विभागीय बजट के आधार पर जल्द ही अमल में लिया जाएगा। जंगल में अवैध घुसपैठ न हो सके, रेंज अफसरों को कड़े निर्देश दिए गए हैं। - नवीन खंडेलवाल, डीएफओ, पीलीभीत टाइगर रिजर्व