सावन में शिव भक्तों का रहता है जमावाड़ा
महोफ जंगल सीमा के समीप स्थित ओड़ाझार शिव मंदिर जनपद ही वरन आसपास जनपदों के श्रद्धालुओं के आस्था का केंद्र है। इस प्राचीन मंदिर में सावन पर शिवभक्तों का खासा जमावाड़ा रहता है। प्रत्येक अमावस व चैत्र को यहां विशाल मेला भी लगता है। मान्यता है कि अमावस के दौरान यहां आने वाले निसंतान दंपत्तियों को संतान की प्राप्ति होती है।
कस्बे से करीब एक किमी दूर जंगल सीमा पर स्थित इस शिव मंदिर का भी इतिहास सदियों पुराना है। कस्बे के बुजुर्ग बताते हैं कि करीब तीन सौ साल पहले उक्त स्थान पर जैन धर्म के लोग निवास करते थे। इसी के चलते इसका नाम जमुनिया रखा गया। बुजुर्ग बताते हैं कि एक बार महामारी के चलते पूरा गांव उजड़ गया। अंग्रेजी हुकूमत के दौरान यहां खेती शुरू हो गई। इस बीच रानी सुंदर कुंवर ब्याह कर आई। उन्होंने सूखा पडने पर खन्नौत नदी के उदगम स्थल के पास तालाब खुदवाया। खुदाई के दौरान एक शिवलिंग निकला। उस शिवलिंग को एक चबूतरे पर रखवा दिया गया। कुछ समय बाद जब गांव के लोगों को इसकी जानकारी हुई तो ग्रामीणों ने शिवलिंग को गांव में लाने के प्रयास शुरू किए। बताते हैं कि ग्रामीणों ने शिवलिंग को एक साथ उठाने का प्रयास किया, लेकिन वह सभी शिवलिंग उठाने में नाकाम रहे। हाथियों का भी सहारा लिया गया, लेकिन प्रयास विफल रहा। इस बीच रजवाड़े परिवार के कुंवर प्रहलाद सिंह ने गांव के समीप ही एक मंदिर की स्थापना कराई। उस दौरान शिवलिंग न उठने की बात सामने आई तो प्रहलाद सिंह समेत पांच लोगों ने शिव की आराधना कर शिवलिंग को उठाने का प्रयास किया। इस बार प्रयास सफल हुआ। मंदिर परिसर में शिवलिंग की स्थापना कर दी गई। इसके चलते लोगों की आस्था मंदिर के प्रति और बढ़ती गई।
इस शिव मंदिर का संचालन मंदिर कमेटी द्वारा किया जा रहा है। मंदिर के नाम दस एकड़ जमीन भी है। मंदिर के पुजारी बाबा राम सिंह दास ने बताया कि यहां अमावस व चैत्र पर विशाल मेला लगता है। जिसमें जनपद ही नहीं बल्कि आसपास जनपदों के श्रद्धालु पूजा अर्चना करने के साथ तमाम तरह के संस्कार भी कराते हैं।