बीसलपुर। बीसलपुर तहसील क्षेत्र के कई इलाके 90 के दशक में आतंकवाद की लपटों में झुलसे थे। बिलसंडा और दियोरिया इलाके में सिखों की काफी आबादी है। यहां जंगल भी हैं। इस वजह से आतंकियों की चहलकदमी रहा करती थी। बिलसंडा का बाजार शाम चार बजते-बजते पूरी तरह से बंद हो जाता था।
पूरनपुर की तरह बिलसंडा के भी कई लोगों का अपहरण कर आतंकवादियों ने मोटी रकम वसूली थी। उस दौरान बिलसंडा के कई व्यापारी अपहरण के डर से अपना व्यापार नौकरों के हवाले कर बरेली में रहने लगे थे। कुछ ने बरेली में ही अपने मकान बनवा लिए थे। आतंकियों का डर इतना था कि उन दिनों दियोरिया और बिलसंडा थानों के पुलिसकर्मी बिना वर्दी के गश्त पर निकलते थे।
पुलिस लाइन में रोजाना डाक ले जाने वाले पैरोकार भी थाने से निकलते ही वर्दी थैलों में रख लेते थे। क्षेत्र में रोजाना कहीं न कहीं घटनाएं होती थीं। दियोरिया से घुंघचाई जाने वाले मार्ग पर तो लोग दिन में भी नहीं गुजरते थे। आलम यह था कि यदि बस में कोई यात्री चादर ओढ़कर चढ़ जाता था, तो चालक-परिचालक और यात्रियों की सांस रुक जाती थी।
दहशत में लोगों ने बिलसंडा और दियोरिया क्षेत्र में अपनी रिश्तेदारी में भी जाना बंद कर दिया था।
खेतों पर बहुत कम जाते थे
मेरा गांव दियोरिया जंगल के पास स्थित है। जब आतंकवाद चरम पर था। वह और उनके गांव के लोग खेतों पर काफी कम जाते थे। बहुत जल्द जरूरी काम निबटाकर घर में आकर कैद हो जाते थे। खेत में काम करते समय चारों तरफ सतर्क नजर रखते थे।
- अतुल कुमार दीक्षित, गांव रंभोजा
उन दिनों दिनचर्या रहती थी अस्त-व्यस्त
उस समय जंगल किनारे सभी गांव के लोगों की दिनचर्या बिल्कुल अस्त-व्यस्त रहती थी। सभी लोग आतंकियों से भयभीत रहते थे। मेरा गांव तो जंगल से बिल्कुल सटा हुआ है। उस समय गांव की गलियां दिन में भी सूनी रहती थीं। बच्चे भी घरों में ही खेलते थे।
- अमित मिश्रा, दियोरिया
अतुल दीक्षित।