पीलीभीत। बिना अधिकारियों से अनुमोदन कराए मृतक आश्रित में पात्र को नौकरी देने के मामले में फंसे प्रभारी डीपीआरओ ने कई दिन बीतने के बाद भी अब तक अपना जवाब नहीं दिया है। प्रभारी डीपीआरओ का जवाब न मिलने पर कार्रवाई अटक गई है। वहीं उनके कार्यकाल के दौरान मृतक आश्रित में इस तरह से बिना अनुमोदन भर्ती किए गए पांचों कर्मचारियों का वेतन रोक दिया गया है।
बीते दिनों मृतक आश्रित के तौर पर की गई नियुक्तियों को लेकर सवाल उठ गए थे। एक पंचायत सचिव की मौत के बाद उसकी बेटी को नौकरी देने के साथ ही कई सफाई कर्मियों की मृतक आश्रित में सीधे नियुक्ति प्रभारी डीपीआरओ ने की थी। आरोप था कि स्थायी डीपीआरओ के तौर पर जिले में किसी की तैनाती नहीं है।
प्रभारी डीपीआरओ के तौर पर प्रमोद कुमार यादव तैनात हैं। ऐसे में उन्हें सीधे भर्ती करने का अधिकार नहीं है। उनके द्वारा मृतक आश्रितों को नौकरी देते वक्त पत्रावली अधिकारियों को नहीं भेजी गई। बिना अनुमोदन कराए ही नौकरी दे दी गई थी। उधर, प्रभारी डीपीआरओ ने लगाए गए आरोपों को गलत बताया था। उनका कहना था कि प्रशासनिक अधिकार के तहत उन्होंने नियुक्तियां की हैं। हालांकि नियुक्ति के नियम को लेकर शिकायत थी। पात्र को लेकर कोई असमंजस नहीं था।
डीएम ने मामला संज्ञान में आने पर सीडीओ को कार्रवाई के निर्देश दिए थे। सीडीओ ने डीपीआरीओ को नोटिस भेजकर जवाब तलब किया था। मगर दस दिन से अधिक बीतने के बाद भी अब तक प्रभारी डीपीआरओ की ओर से कोई जवाब नहीं दिया गया है। कुछ अन्य सफाई कर्मियों की नियुक्ति भी मृतक आश्रित में इसी तरह से कर दी गई। ऐसे में अफसरों के बीच खींचतान का माहौल बना रहा। फिलहाल इस पूरे प्रकरण का निस्तारण न होने सेे असर मृतक आश्रित के तौर पर भर्ती हुए पात्रों पर पड़ा है। उनका वेतन रोक दिया गया है।
मामला संज्ञान में आने पर डीएम के निर्देश पर प्रभारी डीपीआरओ से नोटिस देकर जवाब मांगा गया था। अभी उनकी तरफ से जवाब नहीं भेजा गया है। फिलहाल बिना अनुमोदन नियुक्ति वाले पांच कर्मचारियों के वेतन पर रोक लगा दी गई है।
- श्रीनिवास मिश्र, सीडीओ
कनिष्ठ सहायक और सचिवों पर भी मेहरबानी बरकरार
गबन के मामले में निलंबित किए गए कनिष्ठ सहायक को उसी पद पर तीन माह बाद बहाल करते हुए तैनाती देने के मामले में भी जिला पंचायती राज विभाग के अफसरों की कार्यशैली पर सवाल उठे हैं। मामला उच्चाधिकारियों तक पहुंचा और शिकायत की गई। आरोप लगाए गए कि जिस कर्मचारी को निलंबित करते वक्त संबंधित पटल का ज्ञान न होने का तर्क दिया गया था। अब उसी पटल पर तैनाती कैसे दे दी गई। इसकी अभी तक जांच तक शुरू नहीं कराई जा सकी है। वहीं लंबे समय से एक ही स्थान पर और दर्जनों ग्राम पंचायतों का कार्यभार देख रहे सचिवों पर भी मेहरबानी बनी हुई है। तमाम शिकायतों के बाद भी उन पर सख्ती नहीं हो सकी। पहले अधिकारी एमएलसी चुनाव की आदर्श आचार संहिता का हवाला देकर टरकाते रहे और अब चुप्पी साध ली गई है। घोटालों में फंसने के बाद जांच में दोषी पाने पर रिकवरी के आदेश भी किए गए, लेकिन अभी तक सचिवों से रिकवरी को सख्त कदम नहीं उठाए गए हैं। विकास और पंचायती राज विभाग के कुछ अधिकारियों से साठगांठ के चलते कार्रवाई नहीं हो रही। उनकी पत्रावलियों को फिर दबा दिया गया है।